बाजार का हाल, हर बजट में मां की मूरत
इस वर्ष बाजारों में कलात्मकता का संगम देखने को मिल रहा है। छोटे घरों और दफ्तरों के लिए ₹200 की छोटी प्रतिमाओं से लेकर पंडालों के लिए ₹20,000 तक की भव्य मूर्तियां उपलब्ध हैं। स्थानीय बनाम बाहरी कला, दुकानदारों के अनुसार, कुछ विशेष प्रतिमाएं पड़ोसी राज्यों से मंगाई गई हैं, जबकि अधिकांश मूर्तियों का निर्माण जमशेदपुर के ही स्थानीय मूर्तिकारों ने किया है। इससे स्थानीय कलाकारों को साल भर की मेहनत का फल और रोजगार मिल रहा है।
महंगाई पर भारी आस्था, खरीदारी करने आए श्रद्धालुओं का कहना है कि पिछले साल की तुलना में कीमतों में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन आस्था के सामने महंगाई गौण है। लोग अपनी श्रद्धा और आर्थिक क्षमता के अनुसार प्रतिमाओं का चयन कर रहे हैं।
संकट में पारंपरिक कला, मूर्तिकारों की चिंता
बाजार की रौनक के बीच एक कड़वी सच्चाई भी सामने आई है। स्थानीय मूर्तिकारों ने इस पारंपरिक कला के भविष्य पर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि कम आमदनी, अत्यधिक मेहनत और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के मुकाबले मुनाफा कम है।
नई पीढ़ी की बेरुखी
युवाओं का रुझान इस पुश्तैनी काम की ओर कम हो रहा है। वे इसे करियर के रूप में नहीं देख रहे हैं, मूर्तिकारों का मानना है कि यदि यही स्थिति रही, तो आने वाले समय में हाथों से सुंदर प्रतिमाएं गढ़ने वाली यह कला लुप्त हो सकती है। फिलहाल, शहर का माहौल पूरी तरह भक्तिमय है और श्रद्धालु गाजे-बाजे के साथ मां सरस्वती को अपने घर और शिक्षण संस्थानों में ले जाने की तैयारी में जुटे हैं।