Jharkhand News: झारखंड के अंगीभूत महाविद्यालयों में वर्षों से चल रही इंटरमीडिएट की पढ़ाई अब अंतिम दौर में है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत (NEP-20) सरकार प्लस टू शिक्षा को पूरी तरह स्कूलों के हवाले करने की प्रक्रिया में जुटी है. इसके साथ ही कॉलेजों में संचालित संयुक्त व्यवस्था का अंत तय माना जा रहा है.
कम मानदेय में टिकी पूरी व्यवस्था
राज्य के अलग अलग कॉलेजों में इंटर की पढ़ाई संभालने वाले करीब 600 शिक्षक और लगभग 400 कर्मचारी इस फैसले से सीधे प्रभावित हो रहे हैं. लंबे समय से ये कर्मी बेहद कम मानदेय पर काम कर रहे हैं. शिक्षकों को अधिकतम 12 हजार रुपये और कर्मचारियों को 5 से 6 हजार रुपये प्रतिमाह मिलते रहे हैं. सीमित संसाधनों के बावजूद इन्हीं पर इंटरमीडिएट शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी रही है.
दो महीने में पूरी तरह बंद हो सकती हैं कक्षाएं
सूत्रों के अनुसार अगले दो महीनों में कॉलेजों में इंटर की कक्षाएं पूरी तरह बंद हो सकती हैं. इसके बाद बड़ी संख्या में कर्मियों के सामने काम छिन जाने की स्थिति बन जाएगी. कर्मचारी संगठनों का कहना है कि राज्य में पहले से ही शिक्षकों और गैर शैक्षणिक पदों की भारी कमी है, इसके बावजूद इनके भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट योजना सामने नहीं आई है.
आश्वासन मिले लेकिन नीति नहीं बनी
पिछले वर्ष जब 11वीं की पढ़ाई बंद करने की चर्चा शुरू हुई थी, तब बड़े स्तर पर विरोध हुआ था. उस समय शिक्षा मंत्री और सरकार की ओर से यह भरोसा दिलाया गया था कि किसी को बेरोजगार नहीं होने दिया जाएगा. लेकिन दोनों प्रभावशाली नेताओं के असमय निधन और सरकार की निष्क्रियता के कारण आज तक कोई ठोस समायोजन नीति सामने नहीं आई है.
समाधान की राह अभी भी अधूरी
शिक्षाविदों और कर्मचारी संगठनों का सुझाव है कि अनुभव के आधार पर इन कर्मियों को प्लस टू स्कूलों या अन्य सरकारी शिक्षण संस्थानों में समायोजित किया जाए. स्थायी व्यवस्था होने तक मानदेय के लिए विशेष निधि बनाई जाए और भविष्य की नियुक्तियों में इन्हें प्राथमिकता दी जाए.
सरकार तक पहुंची आवाज
झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रवक्ता कुणाल सारंगी समेत कई विधायकों ने मुख्यमंत्री का ध्यान इस मुद्दे की ओर दिलाया है. मुख्यमंत्री को स्थिति की जानकारी होने के बावजूद अब तक कोई आधिकारिक आदेश नहीं आना प्रभावित परिवारों की चिंता बढ़ा रहा है.
नीति के क्रियान्वयन से शिक्षा व्यवस्था में ढांचा बदल रहा है, लेकिन इससे जुड़े मानव संसाधन की अनदेखी संकट को गहरा बना रही है. समय रहते समायोजन और पुनर्नियोजन की स्पष्ट योजना नहीं बनी तो इसका असर न सिर्फ कर्मचारियों पर बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा.