Jharkhand News: झारखंड की तरक्की की रफ्तार पर कड़े पर्यावरण नियमों और फाइलों की सुस्त चाल ने ब्रेक लगा दिया है. इस समय राज्य की 230 से ज्यादा बेहद जरूरी योजनाएं सरकारी दफ्तरों में धूल फांक रही हैं, जिन्हें शुरू करने के लिए पर्यावरण एवं वन विभाग की हरी झंडी मिलना बहुत जरूरी है. जानकारों की मानें तो इन अटकी हुई फाइलों की वजह से करीब 20,000 करोड़ रुपये का एक बड़ा निवेश अधर में लटका हुआ है. अगर इन फाइलों को जल्द मंजूरी मिल जाए, तो आर्थिक तंगी से जूझ रहे झारखंड को हर साल 3,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की मोटी कमाई (रेवेन्यू) हो सकती है.
कोयला और सोने की खदानों के बड़े प्रोजेक्ट्स पर लटकी तलवार
सबसे ज्यादा मार राज्य के माइनिंग सेक्टर पर पड़ी है, जहां अकेले कोयला और लोहे की खदानों से जुड़े करीब 12,000 करोड़ रुपये के बड़े काम ठप पड़े हैं. इसमें ईसीएल कंपनी का 3,500 करोड़ का “चित्रा ईस्ट” कोयला प्रोजेक्ट शामिल है, जिसके लिए करीब 114 हेक्टेयर जंगली जमीन के इस्तेमाल की फाइल दबी हुई है. वहीं हाथियों के आने-जाने वाले रास्ते और घने जंगलों के बीच फंसे 5,000 करोड़ के “मगध एवं आम्रपाली विस्तार” प्रोजेक्ट पर भी ताला लगा है. इसके अलावा रुंगटा माइन्स का 1,200 करोड़ का “परासी गोल्ड” प्रोजेक्ट भी जंगली जमीन की मंजूरी न मिलने से आगे नहीं बढ़ पा रहा है.
अंधेरे में डूबे कई इलाके, सड़कों का चौड़ीकरण भी पूरी तरह ठप
सिर्फ बड़ी खदानें ही नहीं, बल्कि आम जनता के हक की बिजली और बेहतरीन सड़कें भी इस लेटलतीफी का बुरी तरह शिकार हो रही हैं. झारखंड ऊर्जा संचरण निगम की “कोलेबिरा-कामडारा” और “हंसडीहा-जसीडीह” जैसी बड़ी बिजली ट्रांसमिशन लाइनों का काम वन विभाग की पहली और दूसरी स्टेज की एनओसी (NOC) न मिलने से अटका है. इसी तरह लातेहार और पश्चिमी सिंहभूम जैसे पिछड़े जिलों में दालमा और पलामू टाइगर रिजर्व के पास होने की वजह से “हाटगमहरिया-मनोहरपुर” जैसी दर्जनों जरूरी सड़कों को चौड़ा करने का काम पूरी तरह रुका हुआ है.
मुआवजा जमीन की कमी और ग्राम सभा की कड़क शर्तें बनीं रोड़ा
इन फाइलों के दफ्तरों में लटके रहने के पीछे तीन सबसे बड़े पेंच फंसे हुए हैं. पहला कड़ा नियम यह है कि जितनी वन भूमि का इस्तेमाल होगा, उतनी ही खाली जमीन पर नए पेड़ लगाने होंगे, लेकिन राज्य में ऐसी सही जमीन की भारी कमी है. दूसरा, आदिवासी इलाकों में पेसा कानून के तहत वहां की ग्राम सभा की लिखित रजामंदी लेने में महीनों का समय बर्बाद हो जाता है. तीसरा कारण वन्यजीवों की सुरक्षा का है, जिसके तहत हाथियों और बाघों के सुरक्षित इलाकों में दिल्ली का पर्यावरण मंत्रालय नियमों में रत्ती भर भी ढील देने को तैयार नहीं होता है.