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  • 2026-04-02

Saranda Naxalite Operation: सारंडा का “चक्रव्यूह”, गृह मंत्रालय की डेडलाइन खत्म, पर 1-1 करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा और असीम मंडल अब भी आजाद

Saranda Naxalite Operation: केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा देश से नक्सलवाद के पूर्ण सफाए के लिए तय की गई 31 मार्च 2026 की डेडलाइन आखिरकार समाप्त हो गई है. देश के अधिकांश राज्यों से लाल आतंक के पांव पूरी तरह उखड़ चुके हैं, लेकिन झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम स्थित सारंडा का घनघोर जंगल सुरक्षा बलों के लिए आज भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है. कभी झारखंड के 24 में से 17 जिलों में समानांतर सरकार चलाने वाले माओवादी अब सिमटकर सारंडा के इसी दुर्गम पॉकेट तक ही रह गए हैं, लेकिन लाल आतंक के “सिर” का कुचला जाना अब भी बाकी है.

घेरे के बाहर 1 करोड़ के इनामी “सुपर कमांडर”
सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस के लिए इस वक्त सबसे बड़ी सिरदर्दी भाकपा माओवादी के वे शीर्ष नेता हैं, जिन पर सरकार ने करोड़ों रुपयों का इनाम रखा है. वर्तमान में सारंडा के जंगलों में पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा (1 करोड़ इनामी) और सेंट्रल कमेटी सदस्य असीम मंडल उर्फ आकाश (1 करोड़ इनामी) जैसे दुर्दांत चेहरे सक्रिय हैं. इनके साथ करीब 40 से 45 खूंखार हथियारबंद कैडर का दस्ता टोंटो और छोटानगरा जैसे इलाकों में डटा हुआ है, जिसमें 25 लाख का इनामी अजय महतो उर्फ टाइगर भी शामिल है.

ऑपरेशन मेधा बुरु से टूटी कमर, पर भौगोलिक ढाल बनी कवच
झारखंड पुलिस, कोबरा और सीआरपीएफ ने पिछले कुछ वर्षों में आक्रामक रणनीति अपनाते हुए “ऑपरेशन मेधा बुरु” के तहत नक्सलियों के कई गुप्त बंकर ध्वस्त किए और उनके रसद की सप्लाई चेन को पूरी तरह काट दिया है. यही वजह है कि जो नक्सलवाद कभी राजधानी रांची की दहलीज तक दस्तक देता था, वह अब सारंडा के घने जंगलों की गहराई में दम तोड़ रहा है. हालांकि, इन इलाकों की बेहद पेचीदा भौगोलिक संरचना और घने पहाड़ माओवादियों के लिए प्राकृतिक “सुरक्षा कवच” का काम कर रहे हैं.

आर-पार की जंग की तैयारी, हो सकती है “सर्जिकल स्ट्राइक”
डेडलाइन बीतने के बाद अब पुलिस मुख्यालय और केंद्रीय बलों की रणनीति बेहद आक्रामक होने जा रही है. अधिकारियों का साफ कहना है कि नक्सलियों को सरेंडर पॉलिसी के तहत मुख्यधारा में लौटने का पूरा मौका दिया गया था, लेकिन जो कानून को चुनौती देंगे, उनके खिलाफ अब आर-पार की जंग होगी. सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि चूंकि 31 मार्च की समयसीमा बीत चुकी है, इसलिए केंद्र और राज्य सरकार पर दबाव काफी बढ़ गया है. आने वाले दिनों में सारंडा के जंगलों में नक्सलियों के सफाए के लिए किसी बड़ी मिलिट्री “सर्जिकल स्ट्राइक” जैसी कार्रवाई से इनकार नहीं किया जा सकता.
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