Jamshedpur News: झारखंड सरकार ने राज्य में स्थानीय स्वशासन और त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था को आज के दौर के हिसाब से अधिक प्रभावी और मजबूत बनाने के लिए कमर कस ली है. पंचायती राज विभाग ने “झारखंड पंचायती राज अधिनियम, 2001” की मौजूदा परिस्थितियों में गहन समीक्षा करने के लिए एक उच्च स्तरीय राज्य समिति का गठन किया है. विभाग के सचिव मनोज कुमार द्वारा जारी आधिकारिक आदेश के मुताबिक, इस पहल का मुख्य मकसद पंचायतों और ग्राम सभाओं को जमीनी स्तर पर और अधिक अधिकार देना तथा उनके कामकाज में कानूनी रूप से पारदर्शिता और स्पष्टता लाना है.
हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज और आदिवासी मामलों के जानकार शामिल
इस गठित उच्च स्तरीय कमेटी में कानून के दिग्गजों से लेकर आदिवासी मामलों के जानकारों और रिटायर्ड नौकरशाहों को जगह दी गई है. कमेटी में झारखंड हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज रत्नाकर भेंगरा को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया है. इसके अलावा टीम में रिटायर्ड आईएएस विनोद किस्पोट्टा, आदिवासी मामलों की प्रखर आवाज दयामनी बारला, नामी वकील रश्मि कात्यायन, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रामचंद्र उरांव और दो पेसा (PESA) जिलों के उप विकास आयुक्तों (DDC) सहित कुल 10 से अधिक विषय विशेषज्ञों को शामिल किया गया है.
तीन महीने के भीतर ड्राफ्ट अमेंडमेंट बिल सौंपने की समयसीमा तय
सरकार ने इस भारी-भरकम और कद्दावर समिति को हवा-हवाई चर्चा करने के बजाय परिणाम देने के लिए महज 3 महीने की सख्त समयसीमा (डेडलाइन) दी है. समिति को न सिर्फ अधिनियम के मौजूदा प्रावधानों की समीक्षा करनी है, बल्कि खनिज संसाधन, लघु वनोपज (Forest Produce), भूमि अधिग्रहण और सामाजिक न्याय से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर पंचायतों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित करने वाले सुझाव भी देने हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि समिति को संशोधनों के लिए एक बकायदा “ड्राफ्ट अमेंडमेंट बिल” (संशोधन विधेयक का प्रारूप) भी तैयार कर विभाग को सौंपना होगा.
खनिज और भूमि अधिग्रहण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर मिलेगा हक
यह फैसला इसलिए भी बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि झारखंड एक खनिज बहुल और आदिवासी प्रधान राज्य है, जहां जल, जंगल और जमीन के अधिकार हमेशा से सबसे बड़े मुद्दे रहे हैं. अब तक 2001 के पुराने कानून के तहत ग्राम सभाओं के पास कई क्षेत्रों में सीमित शक्तियां थीं. इस नई समीक्षा और आने वाले संभावित कानून के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि गांव के विकास, माइनिंग और जमीन से जुड़े फैसलों में अब स्थानीय ग्रामीणों और ग्राम सभा की आवाज को दरकिनार करना किसी भी कॉर्पोरेट या अधिकारी के लिए मुमकिन नहीं होगा.