Jharkhand News: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आदिवासी समुदायों की वर्तमान स्थिति पर भावुक और तल्ख टिप्पणी करते हुए इसे लोकतंत्र की कड़वी सच्चाई बताया है. मुख्यमंत्री ने कहा कि जिस आदिवासी समाज ने कभी अंग्रेजों के सामने घुटने नहीं टेके और जल-जंगल-ज़मीन की रक्षा के लिए सदियों तक वीरता से संघर्ष किया, आज वही समुदाय अपने ही देश में बुनियादी हक और पहचान के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है. सोरेन के अनुसार, यह केवल एक राजनीतिक प्रश्न नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक स्वाभिमान का अपमान है जिसे अक्सर व्यवस्था द्वारा अनदेखा कर दिया जाता है.
हूल से उलगुलान तक: ऐतिहासिक क्रांतियों का दिया हवाला
मुख्यमंत्री ने याद दिलाया कि जब देश में औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत भी नहीं हुई थी, तब आदिवासियों ने निर्णायक लड़ाइयां लड़ी थीं. उन्होंने "सिदो-कान्हू" के नेतृत्व में हुए संथाल विद्रोह और "भगवान बिरसा मुंडा" के "उलगुलान" का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि जिन योद्धाओं ने संविधान की नींव रखने से बहुत पहले आजादी की अलख जगाई थी, आज उनके वंशज अपने ही संविधान के दायरे में सम्मान और मान्यता के लिए क्यों तरस रहे हैं? उन्होंने इसे अस्मिता की वह लड़ाई बताया जिसे अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
अस्मिता और हक की तलाश में निर्णायक मोड़
सोरेन का यह बयान ऐसे समय में आया है जब झारखंड में आदिवासी पहचान और जल-जंगल-ज़मीन के अधिकारों को लेकर बहस तेज है. मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि आदिवासियों का संघर्ष केवल भौतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि अपनी प्राकृतिक संपदा और सांस्कृतिक जड़ों की रक्षा के लिए है. उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थानों से आत्मचिंतन की अपील करते हुए कहा कि जब तक समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े इस वीर समुदाय को उनका वाजिब हक और सम्मान नहीं मिलता, तब तक लोकतंत्र का आईना साफ नहीं माना जाएगा.