Big National News: पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं सहित 700 से अधिक नागरिकों ने चुनाव आयोग (ECI) को एक संयुक्त पत्र भेजकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. आरोप है कि 18 अप्रैल को “राष्ट्र के नाम संबोधन” के दौरान प्रधानमंत्री ने आदर्श चुनाव आचार संहिता (MCC) के नियमों का उल्लंघन किया है. शिकायतकर्ताओं का कहना है कि दूरदर्शन, संसद टीवी और ऑल इंडिया रेडियो जैसे सरकारी संसाधनों का उपयोग चुनाव के समय पक्षपातपूर्ण प्रचार के लिए किया गया, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांतों के विरुद्ध है.
विपक्षी दलों पर हमले और आचार संहिता का पेंच
प्रधानमंत्री के जिस भाषण पर विवाद हो रहा है, उसमें उन्होंने महिला आरक्षण बिल (131वें संविधान संशोधन) के पास न हो पाने के लिए कांग्रेस, टीएमसी, सपा और डीएमके जैसी विपक्षी पार्टियों को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया था. शिकायतकर्ताओं का तर्क है कि जब असम, बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही हो, तब सरकारी मंच से राजनीतिक विरोधियों का नाम लेकर आलोचना करना नियमों के खिलाफ है. आचार संहिता के अनुसार, कोई भी मंत्री अपने आधिकारिक कामकाज को चुनावी प्रचार के साथ नहीं जोड़ सकता और न ही सरकारी मशीनरी का राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर सकता है.
कंटेंट हटाने की उठी मांग
चुनाव आयोग को भेजे गए इस पत्र में प्रमुख रूप से तीन मांगें रखी गई हैं. नागरिकों ने मांग की है कि आयोग प्रधानमंत्री के भाषण की सामग्री और प्रसारण के तरीके की गहन जांच करे. यदि आयोग ने इस प्रसारण की पूर्व अनुमति दी थी, तो विपक्षी दलों को भी अपनी बात रखने के लिए सरकारी मीडिया पर बराबर का समय (Equal Airtime) मिलना चाहिए. इसके अलावा, यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो इस संबोधन को सभी सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से तत्काल हटाने और संबंधित पक्षों पर कानूनी कार्रवाई करने की मांग की गई है.
दिग्गज हस्तियों ने संवैधानिक जिम्मेदारी की दिलाई याद
पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, योगेंद्र यादव, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जयती घोष और पूर्व केंद्रीय सचिव ई.ए.एस. सरमा जैसे जाने-माने नाम शामिल हैं. इन हस्तियों का कहना है कि चुनाव आयोग की यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह चुनाव की पवित्रता को बरकरार रखे. उन्होंने जोर देकर कहा कि सत्ताधारी दल द्वारा सरकारी पैसे से चलने वाले मीडिया का एकतरफा इस्तेमाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करता है, जिसे रोकने के लिए आयोग को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए.