विकास दर मजबूत, लेकिन आगे की राह अनिश्चित
सरकार का कहना है कि देश की आर्थिक वृद्धि दर 7.4 फीसदी रही है. यह आंकड़ा कागज पर भले ही उत्साहजनक लगे, लेकिन वैश्विक अस्थिरता, कारोबारी तनाव और घरेलू मांग में सुस्ती के बीच इस रफ्तार को बनाए रखना आसान नहीं होगा. सवाल यह है कि क्या केवल सरकारी खर्च के सहारे अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक आगे बढ़ाया जा सकता है.
पूंजीगत व्यय का बोझ और राज्यों पर जिम्मेदारी
बुनियादी ढांचे के लिए आवंटन बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपये किया गया है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा राज्यों को दिए जाने वाले ब्याज रहित ऋण के रूप में है. यानी निवेश का भार भी अंततः राज्यों पर ही डाला जा रहा है. क्या यह वास्तव में केंद्र की जिम्मेदारी से पीछे हटने का संकेत नहीं है.
इन्फ्रास्ट्रक्चर के सपने और क्षेत्रीय असमानता
बजट में हाई स्पीड रेल लिंक, नए मालवाहक गलियारे, तटीय माल परिवहन और 20 राष्ट्रीय जलमार्गों की बात की गई है. लेकिन इन योजनाओं का क्षेत्रीय वितरण असंतुलित नजर आता है. दक्षिण भारत और कुछ चुनिंदा कॉरिडोरों को प्राथमिकता दी गई, जबकि बिहार जैसे राज्य फिर से हाशिये पर खड़े दिखते हैं. क्या यह विकास का समान मॉडल है या कुछ क्षेत्रों तक सीमित अवसरों की कहानी.
बिहार क्यों बार-बार नजरअंदाज
देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों में शामिल बिहार को इस बजट में कोई विशेष रोडमैप नहीं मिला. हाई स्पीड रेल, औद्योगिक कॉरिडोर और बड़े रोजगार प्रोजेक्ट बिहार के लिए जीवनरेखा बन सकते थे. इसके बावजूद राज्य को केवल सामान्य घोषणाओं तक सीमित रखा गया. क्या यह राजनीतिक प्राथमिकताओं का प्रतिबिंब नहीं है.
विनिर्माण पर जोर, लेकिन रोजगार कहां
सरकार ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के दूसरे चरण और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के विस्तार की घोषणा की है. आवंटन 23,000 करोड़ से बढ़ाकर 40,000 करोड़ रुपये किया गया. फिर भी निजी निवेश अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच पाया. फैक्टरियों की लागत, वैश्विक बाजार की बाधाएं और मांग की कमी इस रणनीति को कमजोर कर रही हैं.
सेवा क्षेत्र की ओर झुकाव और नई अनिश्चितताएं
बजट में सेवा क्षेत्र को खास तवज्जो दी गई है. आईटी सेवाएं, पर्यटन, स्वास्थ्य, सामाजिक देखभाल और रचनात्मक उद्योगों के लिए सहायता की घोषणा की गई. उच्चस्तरीय समिति के जरिए शिक्षा से रोजगार तक की कड़ी जोड़ने की बात कही गई. लेकिन सवाल यह है कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव के बीच क्या ये क्षेत्र पर्याप्त रोजगार पैदा कर पाएंगे.
राजकोषीय संयम या नई उलझन
सरकार ने अब घाटे की जगह ऋण जीडीपी अनुपात को लक्ष्य बनाया है. अगले वर्ष इसे 56.1 फीसदी से घटाकर 55.6 फीसदी करने की बात कही गई है. राजकोषीय घाटा भी केवल 0.1 फीसदी घटेगा. यह बहुत मामूली बदलाव है. क्या यह वास्तव में सुधार है या केवल आंकड़ों का खेल.
बॉन्ड बाजार पर बढ़ता दबाव
सकल बाजार उधारी बढ़कर 17.2 लाख करोड़ रुपये होने वाली है. इससे बॉन्ड यील्ड और ब्याज दरों पर दबाव बढ़ेगा. यह बोझ अंततः उद्योगों और उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा. क्या सरकार ने इसके दीर्घकालिक असर पर पर्याप्त विचार किया है.
छोटे निवेशक और कारोबारी क्या पाए
बजट में कुछ प्रक्रियात्मक सुधार जरूर किए गए हैं. ट्रेड सिस्टम का विस्तार, कुछ कर अपराधों को अपराध मुक्त करना और कस्टम्स में भरोसे पर आधारित ढांचा स्वागत योग्य है. लेकिन क्या यह उन छोटे कारोबारियों के लिए पर्याप्त है जो पहले से ही मंदी से जूझ रहे हैं.
वायदा विकल्प पर सख्ती का संदेश
वायदा और विकल्प कारोबार पर कर बढ़ाया गया है. इससे कुछ बड़े निवेशक नाराज हैं, लेकिन खुदरा निवेशकों को जोखिम से बचाने के लिहाज से यह कदम जरूरी माना जा रहा है. सवाल यह है कि क्या बाजार को स्थिर रखने के लिए इससे आगे भी ठोस सुधार होंगे.
असली सवाल अभी बाकी
बजट 2026 बड़े सपनों और बड़ी संख्याओं से भरा है, लेकिन आम जनता के लिए ठोस राहत कहां है. बिहार जैसे राज्यों को विकास की मुख्यधारा में लाने की ठोस योजना क्यों नहीं. रोजगार, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर केवल घोषणाएं क्यों. क्या यह बजट वास्तव में भविष्य की नींव है या केवल आंकड़ों का आडंबर. यही वह सवाल है जो इस बजट के साथ खड़ा रहता है.