Jharkhand News: झारखंड राज्य पत्थर उद्योग संघ की बिरसा विहार में हुई बैठक में उच्च न्यायालय के एक हालिया फैसले के बाद पैदा हुए संकट पर गंभीर चिंता जताई गई है. हाईकोर्ट में लंबित जनहित याचिका (PIL 1950/2024) के आलोक में अब खनन पट्टों और क्रशर इकाइयों के लिए वन सीमा से 400 मीटर की दूरी अनिवार्य कर दी गई है. इसके साथ ही दो इकाइयों के बीच 500 मीटर का अंतर होना भी जरूरी है, जिसके कारण राज्य के अधिकांश क्रशर और खदानों के संचालन (CTO) पर रोक लग गई है.
दूरी के नियमों में बदलाव से भारी निवेश खतरे में
संघ के अध्यक्ष बंदेश्वर प्रसाद सिंह ने बताया कि वर्ष 2015 से पहले वन सीमा से दूरी का मानक 500 मीटर था, जिसे सरकार ने घटाकर 250 मीटर कर दिया था. इसी नियम के आधार पर राज्यभर के व्यवसायियों ने बैंकों से ऋण लेकर करोड़ों रुपये का भारी निवेश किया था. अब अचानक नियमों में बदलाव होने से 60 से 80 प्रतिशत खदानें और क्रशर इकाइयां बंद होने के कगार पर पहुंच गई हैं, जिससे उद्योगपतियों के सामने बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है.
आम जनता और सरकारी खजाने पर पड़ेगा सीधा असर
पत्थर उद्योग में आए इस गतिरोध से न केवल हजारों मजदूरों की आजीविका छिनने का डर है, बल्कि राज्य सरकार को मिलने वाले राजस्व में भी भारी गिरावट आने की आशंका है. इसके अलावा, गिट्टी उत्पादन प्रभावित होने से इसकी कीमतों में भारी उछाल आएगा, जिसका सीधा असर आम जनता के मकान निर्माण और सरकार के बुनियादी ढांचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) प्रोजेक्ट्स पर पड़ेगा. व्यवसायी नितेश सारदा ने उच्च रॉयल्टी दरों को भी इस उद्योग की प्रगति में एक बड़ी बाधा बताया है.
मुख्यमंत्री से गुहार लगाएगा प्रतिनिधिमंडल
बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि पत्थर उद्योग को बचाने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही मुख्यमंत्री से मुलाकात करेगा. संघ के उपाध्यक्ष अनिल सिंह ने सरकार से तत्काल नियमों में संशोधन करने की मांग की है ताकि बंद पड़ी इकाइयों को फिर से चालू किया जा सके. इस संकट के समाधान के लिए कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर पैरवी तेज करने की रणनीति बनाई गई है, जिसका उद्देश्य राज्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इस क्षेत्र को बचाना है.