Jharkhand News: सुप्रीम कोर्ट ने विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा स्पष्ट कर दी है. शीर्ष अदालत ने कहा है कि यदि विभागीय जांच निष्पक्ष तरीके से और कानून के अनुरूप की गई हो, तो अदालतों को जांच अधिकारी के निष्कर्षों में अनावश्यक दखल नहीं देना चाहिए.
कोर्ट ने कहा कि केवल उसी स्थिति में हस्तक्षेप किया जा सकता है जब जांच के निष्कर्ष पूरी तरह साक्ष्यहीन, तर्कहीन या मनमाने प्रतीत हों. इसके अलावा विभागीय मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित होना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में प्रतिवादी कर्मचारी की बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए बहाल कर दिया. अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे व्यक्ति का सेवा में बने रहना संस्थागत अनुशासन और जनता के विश्वास के लिए नुकसानदायक हो सकता है. खासकर पुलिस जैसे संवेदनशील विभागों में ईमानदारी और विश्वसनीयता सर्वोपरि होती है.
शीर्ष अदालत ने डिवीजन बेंच के पहले दिए गए फैसले को पलटते हुए कहा कि निचली अदालत द्वारा साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन कर सजा को रद्द करना उचित नहीं था. अदालत के अनुसार बर्खास्तगी का फैसला परिस्थितियों के अनुरूप न्यायसंगत और संतुलित प्रशासनिक कदम था.
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केवल विभागीय कार्रवाई तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि आपराधिक पहलुओं की जांच के भी निर्देश दिए हैं.
अदालत ने कहा कि आरोपों में धोखाधड़ी, जालसाजी, प्रतिरूपण और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल जैसे गंभीर अपराध प्रथम दृष्टया सामने आते हैं. इसे देखते हुए कोर्ट ने बिहार और झारखंड के पुलिस महानिदेशकों को निर्देश दिया है कि सक्षम अधिकारियों के माध्यम से पूरे मामले की गहन आपराधिक जांच सुनिश्चित की जाए.