Jharkhand News: झारखंड में हिरासत में हुई मौतों के मामलों पर झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए राज्य सरकार को जमकर फटकार लगाई है. चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य द्वारा पेश किए गए आंकड़े “शब्दों से परे झकझोर देने वाले” हैं. अदालत ने पाया कि वर्ष 2018 से अब तक राज्य में 427 लोगों की पुलिस या न्यायिक हिरासत में मौत हुई, लेकिन कानून के स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद बड़ी संख्या में मामलों की अनिवार्य न्यायिक जांच नहीं कराई गई.
कार्यपालक मजिस्ट्रेटों से जांच कराने पर गंभीर आपत्ति
सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि हिरासत में मौतों के मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 176(1-ए) के तहत अनिवार्य न्यायिक जांच कराने के बजाय, कई मामलों में कार्यपालक मजिस्ट्रेटों से जांच कराई गई. हाईकोर्ट ने सरकार के हलफनामे पर नाराजगी जताते हुए कहा कि सरकार खुद मान रही है कि 427 में से 262 मामलों की जांच कार्यपालक मजिस्ट्रेटों ने की, जबकि कानून ने दो दशक पहले ही उनसे यह अधिकार वापस ले लिया था. खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 176(1-ए) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 196(2) बाध्यकारी कानूनी आदेश हैं, जिनका पालन अनिवार्य है.
सरकारी आंकड़ों में भारी विसंगति पर उठाए सवाल
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों में भी गंभीर विसंगति पाई. सरकार ने रिकॉर्ड में बताया कि 262 जांचें कार्यपालक मजिस्ट्रेटों और 225 जांचें न्यायिक मजिस्ट्रेटों ने कीं, जिससे जांच की कुल संख्या 487 हो जाती है, जबकि कुल मौतों की संख्या 427 ही बताई गई है. अदालत ने कहा कि यह विरोधाभास सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है और कानून के प्रति संस्थागत उदासीनता को दर्शाता है. कोर्ट ने याद दिलाया कि हिरासत में अस्वाभाविक मौत पर मुआवजा मिलना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत पीड़ित का संवैधानिक अधिकार है.
सभी पुराने मामलों की नए सिरे से न्यायिक जांच के आदेश
इस कड़े रुख के बाद हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि वर्ष 2018 से अब तक जिन भी मामलों की जांच कार्यपालक मजिस्ट्रेटों ने की थी, उनकी जिला-वार सूची तैयार की जाए. संबंधित प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश (पीडीजे) 15 दिनों के भीतर इन मामलों के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट नामित करेंगे और इस जांच को हर हाल में छह महीने के भीतर पूरा किया जाएगा. इसके अतिरिक्त, झारखंड न्यायिक अकादमी के निदेशक को भी चार महीने के भीतर इस प्रकार की जांच रिपोर्ट तैयार करने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और प्रारूप तैयार करने का जिम्मा सौंपा गया है.
भविष्य के मामलों के लिए तय की गई सख्त गाइडलाइन
अदालत ने भविष्य के लिए कड़ा दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा है कि अब से हिरासत में मौत, गायब होने या दुष्कर्म की किसी भी घटना की सूचना 24 घंटे के भीतर राष्ट्रीय व राज्य मानवाधिकार आयोग और संबंधित प्रधान जिला जज को देनी होगी. सूचना मिलने के 48 घंटे के भीतर प्रधान जिला जज द्वारा एक न्यायिक मजिस्ट्रेट की नियुक्ति की जाएगी, जिन्हें सामान्यतः दो महीने के भीतर अपनी जांच पूरी करनी होगी. हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि कानून के शासन वाले सभ्य समाज में हिरासत में हिंसा न्याय की मूल भावना पर सीधा प्रहार है और राज्य सरकार अपनी सुविधा से जांच के नियम तय नहीं कर सकती.