UCIL Jaduguda: देश को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और खनिज संपदा के शत-प्रतिशत वैज्ञानिक उपयोग के लिए दो बड़ी सरकारी कंपनियां हाथ मिलाने जा रही हैं. पूर्वी सिंहभूम की ऐतिहासिक सिंहभूम कॉपर बेल्ट (घाटशिला, मुसाबनी और जादूगोड़ा क्षेत्र) में हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (HCL) और यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (UCIL) मिलकर एक बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम कर रहे हैं. जादूगोड़ा स्थित यूसीआईएल मुख्यालय में सीएमडी डॉ. कंचम आनंद राव के नेतृत्व में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में तय हुआ है कि तांबा खनन के बाद बचने वाले अपशिष्ट यानी "कॉपर टेलिंग्स" (कचरे) से आधुनिक तकनीक के जरिए यूरेनियम की रिकवरी की जाएगी. इसके लिए जादूगोड़ा में एक विशेष यूरेनियम रिकवरी प्लांट स्थापित करने की तैयारी युद्ध स्तर पर चल रही है.
मुसाबनी कंसंट्रेटर प्लांट से हर साल मिलेगा 7.5 लाख टन अपशिष्ट
इस प्रस्तावित कार्ययोजना के तहत एचसीएल धोबनी-पाथरगोरा, नंदुप-रामचंद्रपहाड़ और धदकीडीह जैसे नए कॉपर ब्लॉकों से तांबा अयस्क निकालकर उसकी प्रोसेसिंग करेगा. इस प्रक्रिया के बाद जो टेलिंग्स बचेगी, उसे यूसीआईएल के जादूगोड़ा प्लांट में भेजा जाएगा, जहां उन्नत तकनीक से यूरेनियम को अलग किया जाएगा. यूरेनियम निकालने के बाद बचा हुआ शेष पदार्थ वापस एचसीएल को सौंप दिया जाएगा. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2028-29 तक केवल मुसाबनी कंसंट्रेटर प्लांट से ही सालाना लगभग 7.5 लाख टन कॉपर टेलिंग्स उपलब्ध होने का अनुमान है, इसके अलावा सुरदा, केंदाडीह और राखा माइंस के पुराने टेलिंग्स डंप का उपयोग भी यूरेनियम निकालने के लिए करने पर विचार हो रहा है.
2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा का लक्ष्य, स्थानीय स्तर पर मिलेगा रोजगार
यह संयुक्त उद्यम भारत की रणनीतिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भविष्य के लिए एक बड़ा गेम-चेंजर साबित होगा. भारत सरकार ने वर्ष 2047 तक देश में 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता हासिल करने का एक बड़ा और महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, जिसे पूरा करने के लिए घरेलू स्तर पर यूरेनियम का उत्पादन बढ़ाना बेहद जरूरी है. आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से, इस मेगा प्रोजेक्ट के शुरू होने से जादूगोड़ा, मुसाबनी और घाटशिला के स्थानीय इलाकों में बड़े पैमाने पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे. साथ ही, औद्योगिक गतिविधियों में तेजी आने से क्षेत्र के बुनियादी ढांचे और इन्फ्रास्ट्रक्चर को भी भारी मजबूती मिलेगी.
माइनिंग वेस्ट के वैज्ञानिक रीप्रोसेसिंग से सुधरेगा पर्यावरण
यह परियोजना न केवल आर्थिक और सामरिक रूप से देश के लिए लाभकारी है, बल्कि पर्यावरण प्रबंधन की दिशा में भी एक बेहतरीन मिसाल पेश करेगी. खदानों के पुराने अपशिष्ट (Mining Waste) का वैज्ञानिक तरीके से पुनः प्रसंस्करण (Reprocessing) करने से पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में बहुत मदद मिलेगी. दो दिग्गज सार्वजनिक उपक्रमों का यह आपसी तालमेल और अनूठी तकनीक आने वाले समय में देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में झारखंड और विशेषकर जमशेदपुर के सिंहभूम क्षेत्र की भूमिका को पूरे देश में सबसे महत्वपूर्ण और अग्रणी बनाएगा.