National News: देश की सर्वोच्च अदालत की एक टिप्पणी ने शिक्षा व्यवस्था, पाठ्यपुस्तकों और अभिव्यक्ति की सीमा को लेकर नई बहस छेड़ दी है. मामला एनसीईआरटी की किताबों में इस्तेमाल किए गए कार्टून और व्यंग्यात्मक सामग्री से जुड़ा है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि स्कूली किताबें कार्टून दिखाने की जगह नहीं हैं, खासकर तब जब उन्हें पढ़ने वाले बच्चे कम उम्र के हों और हर बात का गहरा असर उनके मन पर पड़ता हो. अदालत की इस टिप्पणी के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि बच्चों को लोकतंत्र, न्यायपालिका और संस्थाओं के बारे में किस तरह की सोच के साथ पढ़ाया जाना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा बच्चों के दिमाग पर पड़ सकता है गलत असर
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के सामने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि सामान्य परिस्थितियों में कार्टून या व्यंग्य से किसी को परेशानी नहीं होती. लेकिन जब वही चीजें स्कूल की किताबों में शामिल की जाती हैं, तब मामला संवेदनशील हो जाता है. उन्होंने कहा कि स्कूली बच्चे ऐसी उम्र में होते हैं जहां वे हर बात को तेजी से ग्रहण करते हैं और उनकी सोच आसानी से प्रभावित हो सकती है. ऐसे में अगर पाठ्यपुस्तकों में संस्थाओं को लेकर व्यंग्यात्मक चित्र या सामग्री दी जाती है, तो इससे बच्चों के मन में गलत संदेश जा सकता है. तुषार मेहता ने अदालत में स्पष्ट शब्दों में कहा कि पाठ्यपुस्तकें वह जगह नहीं हैं जहां कार्टूनों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या उपहास और व्यंग्य को बच्चों की पढ़ाई का हिस्सा बनाया जाना सही है.
जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने बनाई विशेष कमेटी
इस मामले को गंभीर मानते हुए जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने एनसीईआरटी की किताबों में मौजूद कार्टून और अन्य विवादित सामग्री की जांच के आदेश दिए हैं. अदालत ने इसके लिए सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में एक विशेष कमेटी गठित की है. यह कमेटी अब उन सभी सामग्रियों की समीक्षा करेगी जिन पर सवाल उठे हैं और यह जांच करेगी कि उनका बच्चों की सोच और शिक्षा पर क्या असर पड़ सकता है.
पहले व्यंग्य का समर्थन कर चुकी अदालत ने अब अपनाया सतर्क रुख
दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में व्यंग्य और आलोचना की स्वतंत्रता का समर्थन कर चुका है. अदालत ने पहले कहा था कि व्यंग्य को किसी अति संवेदनशील व्यक्ति के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. लेकिन इस बार मामला बच्चों की शिक्षा और पाठ्यपुस्तकों से जुड़ा होने के कारण अदालत ने ज्यादा सतर्क रुख अपनाया है. अदालत का मानना है कि बच्चों को दी जाने वाली सामग्री बेहद संतुलित और जिम्मेदारी भरी होनी चाहिए.
कक्षा 8 की किताब से शुरू हुआ पूरा विवाद
यह पूरा मामला कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब एक्सप्लोरिंग सोसाइटी इंडिया एंड बियॉन्ड से शुरू हुआ था. किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़ा एक अध्याय शामिल किया गया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया. अदालत ने माना कि इस तरह की सामग्री न्यायपालिका की गरिमा और प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकती है. इसी को लेकर किताब में शामिल कुछ हिस्सों और कार्टूनों पर सवाल उठाए गए थे.
तीन शिक्षाविदों पर हुई थी सख्त टिप्पणी, अब राहत मिली
इस मामले में पहले अदालत ने प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की थी. अदालत ने संबंधित संस्थानों से कहा था कि वे इन शिक्षाविदों से दूरी बनाएं. हालांकि शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में बदलाव करते हुए उनके खिलाफ लगाए गए प्रतिबंध हटा दिए. अदालत ने उनका स्पष्टीकरण स्वीकार कर लिया और उन्हें राहत दी.
एनसीईआरटी ने मानी गलती, विवादित सामग्री हटाई गई
पूरे विवाद के बाद एनसीईआरटी ने भी अपनी ओर से माफी मांगी है. संस्था ने कहा कि यह सामग्री अनजाने में हुई एक गलती का हिस्सा थी. एनसीईआरटी ने विवादित कंटेंट को किताब से हटाने का फैसला भी लिया है. अब शिक्षा जगत और अभिभावकों की नजर जस्टिस इंदु मल्होत्रा कमेटी की रिपोर्ट पर टिकी हुई है.
बच्चों की किताबों में व्यंग्य की जगह होनी चाहिए या नहीं, अब इसी पर होगी बड़ी बहस
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद अब देशभर में यह बहस तेज हो गई है कि क्या स्कूली किताबों में व्यंग्य और कार्टूनों को जगह मिलनी चाहिए. एक पक्ष इसे अभिव्यक्ति और समझ बढ़ाने का तरीका मानता है, जबकि दूसरा पक्ष कहता है कि कम उम्र के बच्चों के सामने संस्थाओं को लेकर बेहद सावधानी से सामग्री रखी जानी चाहिए. अब आने वाले समय में जस्टिस इंदु मल्होत्रा कमेटी की रिपोर्ट यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है कि भविष्य की स्कूली किताबों का स्वरूप कैसा होगा और बच्चों को लोकतंत्र तथा संस्थाओं के बारे में किस तरीके से पढ़ाया जाएगा.