Jharkhand News: पलामू में पुलिस कस्टडी में युवक की मौत और कथित प्रताड़ना के मामले में झारखंड हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. अदालत ने पूरे मामले की जांच मजिस्ट्रेट की अगुवाई में कराने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने माना कि मामले में पुलिस और स्वास्थ्य अधिकारियों की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं.
यह मामला महफूज अहमद की मौत से जुड़ा है. परिजनों ने आरोप लगाया था कि नवाबाजार थाना क्षेत्र की पुलिस ने महफूज को अवैध हिरासत में रखकर प्रताड़ित किया, जिसके बाद उसकी हालत बिगड़ गई और इलाज के दौरान रिम्स में उसकी मौत हो गई.
परिजनों ने लगाया था 5 दिनों तक अवैध हिरासत का आरोप
मृतक के परिजनों के अनुसार, 1 मार्च 2025 को महफूज को पुलिसकर्मी उसके नर्सिंग होम से जबरन उठाकर ले गए थे. आरोप है कि उसे कई दिनों तक थाने में रखा गया और उसके साथ मारपीट की गई.
परिजनों ने तत्कालीन पलामू एसपी समेत पुलिस अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए थे. उनका कहना था कि हालत बिगड़ने के बाद पुलिस ने खुद को बचाने के लिए गलत तरीके से एफआईआर दर्ज कर उसे कोर्ट में पेश किया.
फिटनेस सर्टिफिकेट को लेकर हाई कोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा
सुनवाई के दौरान मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट को लेकर कई विसंगतियां सामने आईं. पुलिस ने 6 मार्च 2025 को महफूज को कोर्ट में पेश करते समय मेडिकल फिटनेस रिपोर्ट दाखिल की थी, जिसमें उसे हिरासत के लिए फिट बताया गया था.
लेकिन कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि महफूज को इससे पहले ही रिम्स रेफर किया जा चुका था. ऐसे में अदालत ने सवाल उठाया कि जब वह अस्पताल रेफर हो चुका था, तो बाद में फिटनेस सर्टिफिकेट कैसे जारी हुआ.
सुनवाई के दौरान मेदिनी राय मेडिकल कॉलेज अस्पताल के डिप्टी सुपरिटेंडेंट ने स्वीकार किया कि पुलिस ने उन्हें फिटनेस सर्टिफिकेट की मूल प्रति नहीं दी थी और फोटोकॉपी के आधार पर रिपोर्ट दी गई थी.
पुलिस ने आरोपों को नकारा, बताया उग्रवादी संगठन से जुड़ा
वहीं राज्य सरकार और पुलिस की ओर से आरोपों को खारिज किया गया. पुलिस ने दावा किया कि महफूज अहमद प्रतिबंधित संगठन टीएसपीसी से जुड़ा था और उसे गुप्त सूचना के आधार पर गिरफ्तार किया गया था.
पुलिस के अनुसार, गिरफ्तारी के दौरान उसके पास से हथियार, कारतूस और चोरी की बाइक बरामद हुई थी. पुलिस ने डिजिटल साक्ष्यों और कॉल रिकॉर्ड का भी हवाला दिया.
हाई कोर्ट ने दिए जांच के आदेश
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए पलामू के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को निर्देश दिया कि मजिस्ट्रेट की निगरानी में पूरे मामले की जांच कराई जाए.
जांच रिपोर्ट आने के बाद दोषी पाए जाने वाले पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों पर कार्रवाई की जा सकती है. मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शादाब इकबाल और आयुष ने पक्ष रखा.