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  • 2026-06-27

Seraikela News: 20 दिनों से हाथियों के आतंक में जी रहे मैसाड़ा और कालीचामदा के ग्रामीण, समाधान को लेकर उठे कई सवाल

Seraikela: सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल डैम बहुउद्देशीय परियोजना क्षेत्र से सटे मैसाड़ा और कालीचामदा गांवों में पिछले करीब 20 दिनों से जंगली हाथियों का आतंक बना हुआ है। हाथियों के लगातार गांवों में प्रवेश करने से ग्रामीण भय के साये में जीवन बिता रहे हैं। वहीं स्थानीय जनप्रतिनिधि और ग्रामीण वन विभाग से हाथियों को स्थायी रूप से हटाने की मांग कर रहे हैं। चांडिल वन विभाग की क्विक रिस्पांस टीम (QRT) प्रतिदिन प्रभावित गांवों में पहुंचकर हाथियों को जंगल की ओर खदेड़ने का प्रयास कर रही है। टीम रातभर अभियान चलाती है, लेकिन हाथियों का झुंड कुछ समय बाद फिर उसी क्षेत्र में लौट आता है। इससे ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

भोजन और पानी की तलाश में बदल रहा हाथियों का रूट
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी क्षेत्र में भोजन और पानी की कमी के कारण हाथियों के झुंड चांडिल वन क्षेत्र की ओर पलायन कर रहे हैं। चांडिल डैम और जलाशय क्षेत्र में उन्हें पर्याप्त पानी और भोजन उपलब्ध होने के कारण वे बार-बार इसी इलाके में लौट आते हैं। शाम ढलते ही हाथियों का झुंड गांवों में प्रवेश कर घरों को नुकसान पहुंचाता है और अनाज भी नष्ट कर देता है। वन विभाग ने हाल ही में दो QRT टीमों के साथ विशेष अभियान चलाया था। पूरी रात अभियान चलाकर हाथियों को ईचागढ़ स्थित पुराने थाना बोर्डिंग स्कूल क्षेत्र तक पहुंचाया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण भी वन विभाग की टीम के साथ मौजूद रहे। हालांकि रात करीब दो बजे हाथियों को नहर पार कराने के दौरान एक युवक की जल्दबाजी के कारण झुंड रास्ता भटक गया और दोबारा मैसाड़ा गांव की ओर लौट आया।

स्थानीय लोग परियोजना को मान रहे बड़ी वजह
ग्रामीणों का एक वर्ग मानता है कि हाथी-मानव संघर्ष की मूल वजह चांडिल डैम और स्वर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना है। उनका कहना है कि डैम निर्माण के दौरान हाथियों का प्राकृतिक आवागमन मार्ग (कॉरिडोर) प्रभावित हुआ, जिससे हाथियों का रूट बदल गया और वे अब गांवों की ओर आने लगे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि टाटा कंपनी स्वर्णरेखा परियोजना को पानी के उपयोग के बदले हर महीने करोड़ों रुपये का राजस्व देती है। इसके बावजूद परियोजना की ओर से प्रभावित क्षेत्रों में हाथी-मानव संघर्ष को कम करने या ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस पहल नहीं की गई है। ऐसे में ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि यदि परियोजना इस समस्या की एक वजह है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

वन विभाग का पक्ष
वन विभाग का कहना है कि डैम बनने के बाद से हाथियों की गतिविधियों में बदलाव आया है। विभाग सीमित संसाधनों के बावजूद लगातार QRT टीम, पटाखों, टॉर्च और अन्य उपायों के माध्यम से हाथियों को गांवों से दूर रखने का प्रयास कर रहा है। हालांकि हाथियों के लिए पर्याप्त भोजन और पानी उपलब्ध होने के कारण वे बार-बार उसी क्षेत्र में लौट आते हैं। ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि केवल हाथियों को खदेड़ने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उनका मानना है कि हाथियों के प्राकृतिक आवास, वैकल्पिक कॉरिडोर और दीर्घकालिक प्रबंधन की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। तभी इस क्षेत्र में बढ़ते हाथी-मानव संघर्ष पर प्रभावी नियंत्रण संभव हो सकेगा।



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