Ranchi News : झारखंड हाईकोर्ट ने अवैध रूप से दुकान ध्वस्त किए जाने के मामले में राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए उसकी लेटर्स पेटेंट अपील (LPA) खारिज कर दी है। चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए बुलडोजर से दुकान तोड़ना सरकारी शक्ति का स्पष्ट दुरुपयोग और मनमानी कार्रवाई है।
खंडपीठ ने चतरा के उपायुक्त (DC) को निर्देश दिया कि वे एक सप्ताह के भीतर 5.25 लाख रुपये झारखंड हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा कराएं। अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्धारित समय में राशि जमा कराने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी उपायुक्त की होगी। राशि जमा होने के बाद याचिकाकर्ता अपनी पहचान और बैंक विवरण प्रस्तुत कर मुआवजा प्राप्त कर सकेंगे।
13 साल बाद भी सबूत नहीं दे सकी सरकार, कोर्ट ने जताई नाराजगी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार की अपील न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग प्रतीत होती है और ऐसा लगता है कि इसे उन अधिकारियों ने प्रेरित किया है जिन्हें भविष्य में मुआवजे की राशि की वसूली अपने ऊपर होने की आशंका है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता होती, तो वह मुआवजे की राशि बढ़ाने के लिए होती, क्योंकि एकलपीठ द्वारा निर्धारित राशि भी अपेक्षाकृत कम थी।
यह मामला चतरा निवासी राजेंद्र प्रसाद साहू उर्फ राजेंद्र प्रसाद शौंडिक की दुकान से जुड़ा है। उन्होंने वर्ष 2011 में हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि प्रशासन ने प्लॉट संख्या-296, खाता संख्या-36 स्थित उनकी दुकान को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के ध्वस्त कर दिया।
एकलपीठ ने 27 जून 2024 को राज्य सरकार को दुकान निर्माण लागत के रूप में 5 लाख रुपये तथा मानसिक पीड़ा के लिए 25 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। आदेश का पालन नहीं होने पर याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका भी दायर की।
सुनवाई के दौरान सरकार ने दावा किया कि संबंधित भूमि वर्ष 1914 में अधिग्रहित की गई थी और पुराने दस्तावेज पेश करने की अनुमति मांगी। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि 13 वर्षों तक चली सुनवाई के दौरान सरकार ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकी और अंतिम चरण में ऐसा प्रयास अधिकारियों की मनमानी को और उजागर करता है। अदालत ने यह भी कहा कि प्रस्तुत दस्तावेज विवादित भूमि से संबंधित होने का स्पष्ट प्रमाण नहीं देते और वर्ष 1973 की पंजीकृत बिक्री विलेख के आधार पर हुए म्यूटेशन को सरकार ने इतने वर्षों तक चुनौती भी नहीं दी।