Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में मध्यस्थता के जरिए हुए समझौते को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब दोनों पक्ष मध्यस्थता के दौरान किसी समझौते पर सहमत हो जाएं, उसकी शर्तों पर हस्ताक्षर कर दें और उसे अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर दिया जाए, तो बाद में केवल अपना मन बदल जाने की वजह से कोई पक्ष समझौते से पीछे नहीं हट सकता.
कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता के दौरान हुआ समझौता कानूनी महत्व रखता है. खासकर तब, जब समझौते के आधार पर किसी पक्ष ने अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करना शुरू कर दिया हो. ऐसी स्थिति में दूसरे पक्ष का एकतरफा तरीके से समझौते से बाहर निकलना स्वीकार नहीं किया जा सकता.
19 अगस्त 2025 को मध्यस्थता में बनी थी सहमति
यह मामला दुमका फैमिली कोर्ट से संबंधित है. पति रवि कुमार ने फैमिली कोर्ट के 14 नवंबर 2024 के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनकी तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी.
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की सहमति से मामले को विशेष मध्यस्थता अभियान “मेडिएशन फॉर द नेशन” के तहत भेजा गया. 19 अगस्त 2025 को मध्यस्थता की प्रक्रिया के दौरान पति-पत्नी ने तलाक समेत अपने आपसी विवादों को सहमति से खत्म करने पर हामी भरी.
समझौते में तय हुआ था कि पति पत्नी को स्थायी भरण-पोषण के तौर पर 35 लाख रुपये देगा. इसके अलावा बेटे की शिक्षा और अन्य खर्चों के लिए 40 लाख रुपये तथा बच्चे के इलाज के लिए 5 लाख रुपये देने पर भी सहमति बनी थी.
समझौते के बाद पति ने पत्नी को दिए 35 लाख रुपये
समझौते के बाद रवि कुमार ने दो अलग-अलग किस्तों में NEFT के जरिए पत्नी के खाते में 35 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए. इसके बाद पत्नी ने समझौते में तय कुछ शर्तों को मानने से इनकार कर दिया.
पत्नी की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि मध्यस्थता के समय उसकी परिस्थितियां अलग थीं. बाद में उसे लगा कि वैवाहिक रिश्ते को एक और अवसर दिया जाना चाहिए. इसी वजह से उसने तलाक से संबंधित समझौते को आगे लागू करने से इनकार किया.
कोर्ट ने कहा- सिर्फ मन बदलना पर्याप्त आधार नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता की प्रक्रिया पूरी होने से पहले कोई भी पक्ष समझौते से पीछे हट सकता है. लेकिन जब दोनों पक्ष सहमत हो जाएं, समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए जाएं और उसे अदालत के रिकॉर्ड में पेश कर दिया जाए, तब केवल विचार बदलने को समझौता खत्म करने का आधार नहीं माना जा सकता.
कोर्ट ने इस मामले में यह भी देखा कि पति समझौते के तहत अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए 35 लाख रुपये का भुगतान कर चुका था. दूसरी ओर पत्नी ने अदालत के सामने समझौते की शर्तों को स्वीकार करने की बात कही थी.
ऐसे में एक पक्ष द्वारा समझौते के तहत अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के बाद दूसरे पक्ष का अचानक उससे पीछे हटना उचित नहीं है. हाईकोर्ट ने इस संदर्भ में Estoppel के सिद्धांत का भी उल्लेख किया.
छह महीने में समझौते की सभी शर्तें पूरी करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को 19 अगस्त 2025 को हुए समझौते की सभी शर्तों को अगले छह महीने के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया है.
अदालत ने दोनों पक्षों को संबंधित फैमिली कोर्ट में आपसी सहमति से तलाक के लिए संयुक्त याचिका दाखिल करने को भी कहा है. फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि याचिका मिलने के बाद कानून के मुताबिक उचित आदेश पारित करे.
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि समझौते में शामिल कोई पक्ष तय शर्तों का पालन नहीं करता है, तो दूसरा पक्ष उपलब्ध उचित कानूनी उपाय के तहत संबंधित अदालत या मंच का रुख कर सकता है.