Chaibasa: नशे के खिलाफ लड़ाई में अक्सर पुलिस कार्रवाई या प्रशासनिक अभियान की बात होती है, लेकिन पश्चिमी सिंहभूम के तांतनगर प्रखंड के सेरेंगबिल गांव की मंजू बिरूली ने शांतिपूर्ण सत्याग्रह को अपना हथियार बनाया. पति की नशे की आदत से परेशान मंजू ने अपने घर की समस्या को पूरे समाज की समस्या समझा और गांव में हड़िया-दारू के खिलाफ जागरूकता अभियान शुरू कर दिया. लगातार समझाने और विरोध करने के उनके प्रयास का असर धीरे-धीरे ग्रामीणों पर पड़ा.
पति की आदत ने दिखाई नशे की दूसरी तस्वीर
मंजू बिरूली के पति के नशापान के कारण परिवार में अक्सर विवाद की स्थिति बनती थी. इससे परेशान मंजू ने महसूस किया कि शराब और हड़िया का असर केवल एक घर तक सीमित नहीं है. इसकी वजह से कई परिवारों में घरेलू कलह, आर्थिक परेशानी और सामाजिक समस्याएं पैदा हो रही हैं. इसके बाद उन्होंने नशे के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया. हालांकि उन्होंने किसी तरह के टकराव या विवाद का रास्ता नहीं चुना, बल्कि लोगों को समझाने और जागरूक करने को अपना माध्यम बनाया.
जहां बनता था हड़िया-दारू, वहीं शुरू कर देती थीं सत्याग्रह
मंजू के अभियान का तरीका बिल्कुल अलग था. गांव में जिस घर में हड़िया या दारू बनाए जाने की जानकारी मिलती, वह वहां पहुंच जाती थीं. इसके बाद उसी जगह बैठकर शांतिपूर्ण तरीके से नशे का विरोध करती थीं. सुबह से लेकर रात तक बैठकर वह लोगों से नशे से होने वाले नुकसान पर बातचीत करतीं और परिवार तथा समाज पर पड़ने वाले इसके प्रभाव को समझाती थीं. शुरुआत में उनके लिए यह आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने अपना प्रयास नहीं छोड़ा.
ग्रामसभा में भी उठाई नशाबंदी की आवाज
ग्रामीण मुंडा गौरी शंकर बिरुली के अनुसार, एक बार गांव में ग्रामसभा आयोजित की गई थी. बैठक में गांव के विकास, मनरेगा, बागवानी, साफ-सफाई और स्वच्छता समेत कई मुद्दों पर चर्चा हो रही थी. इसी दौरान मंजू ने सवाल उठाया कि जब गांव की दूसरी समस्याओं पर चर्चा हो रही है तो नशापान रोकने के मुद्दे को क्यों नहीं शामिल किया जा रहा. जब उन्हें बाद में इस विषय पर चर्चा करने की बात कही गई तो उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि नशे की रोकथाम पर चर्चा होने तक वह अपनी जगह से नहीं उठेंगी. ग्रामीणों के समझाने के बावजूद मंजू अपने फैसले पर कायम रहीं. इसके बाद ग्रामसभा में नशापान की रोकथाम को लेकर चर्चा की गई. ग्रामीणों का कहना है कि इस पहल के बाद लोगों में नशे के नुकसान को लेकर जागरूकता बढ़ी.
धीरे-धीरे बदला ग्रामीणों का नजरिया
लगातार चलाए गए अभियान का असर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा. जिन घरों में हड़िया और दारू बनाने का काम होता था, वहां भी लोगों ने इस पर विचार करना शुरू किया. ग्रामीणों के बीच नशे के खिलाफ जागरूकता बढ़ी और लोगों ने इससे दूरी बनाने की दिशा में कदम उठाए. इस पूरे अभियान में मंजू ने समझाने और शांतिपूर्ण विरोध का रास्ता अपनाया. यही वजह रही कि उनका प्रयास किसी बड़े विवाद के बजाय सामाजिक जागरूकता के अभियान में बदलता गया.
करीब दो हजार की आबादी वाला गांव बना उदाहरण
सेरेंगबिल गांव की आबादी करीब दो हजार बताई जाती है. यहां मंजू बिरूली की पहल को अब नशे के खिलाफ सामुदायिक प्रयास की मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है. मंजू का मानना है कि नशे का असर केवल इसे करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका परिवार भी इसकी चपेट में आता है. इसलिए समाज के लोगों को मिलकर नशे के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने और खासकर युवाओं को इससे दूर रखने की जरूरत है.
एक महिला के संकल्प से शुरू हुआ बदलाव
सेरेंगबिल की कहानी यह दिखाती है कि सामाजिक बदलाव के लिए हमेशा टकराव का रास्ता जरूरी नहीं होता. धैर्य, लगातार प्रयास और शांतिपूर्ण तरीके से भी लोगों की सोच में बदलाव लाया जा सकता है. मंजू बिरूली ने जिस समस्या के खिलाफ अपने घर से आवाज उठाई थी, उसे धीरे-धीरे पूरे गांव के मुद्दे में बदल दिया. उनका यह प्रयास अब नशे के खिलाफ जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी की प्रेरक कहानी बन गया है.