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1947 के बंटवारे ने जब भारत को दो टुकड़ों में बांटा तो पाकिस्तान मुस्लिम राष्ट्र के रूप में सामने आया. जब देश का ही एक धर्म हो, तो स्वाभाविक है कि अन्य धर्मों के लोग वहां दूसरे दर्जे के नागरिक होंगे. लेकिन पाकिस्तान में हिंदू सिर्फ दूसरे दर्जे के नागरिक नहीं हैं, उनके साथ दुर्व्यवहार भी किया जाता है. खासकर लड़कियों के साथ तो बहुत ही बुरा व्यवहार होता है.
जबरनधर्मांतरण और शादी इसका जीवंत उदाहरण है. भारत–पाक के बीच राजनीतिक संबंधों की कटुता का प्रभाव भी पाकिस्तानी हिंदू झेलते रहे हैं. एक नया वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक हिंदू व्यक्ति अपनी बहू–बेटियों की रक्षा के लिए पीएम मोदी से हाथ जोड़कर निवेदन कर रहा है. वह यह अपील कर रहा है कि हिंदुओं की अपील पर ध्यान दें, चाहे वो माइग्रेशन चाहते हों या फिर रिफ्यूजी ही बनकर रहना चाहते हों.
एक पाकिस्तानी हिंदू की फरियाद सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें वे पीएम मोदी से यह अपील कर रहे हैं कि उनकी बहू-बेटियों को बचा लिया जाए. वे हाथ जोड़कर भारत के विपक्षी पार्टियों के नेता से भी अपील कर रहे हैं कि वे प्लीज पाकिस्तानी हिंदू लड़कियों को बचा लें. इस रिटायर वृद्ध व्यक्ति का कहना है कि पाकिस्तान में उनकी बहू-बेटियां असुरक्षित हैं, उनके साथ अन्याय होता है, उनका अपहरण कर जबरन उनका धर्म परिवर्तन करा दिया जाता है.
पहलगाम की घटना के बाद वहां हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ा है, हालांकि वह व्यक्ति पहलगाम की घटना का जिक्र नहीं करते हैं, लेकिन यह कहते हैं कि दो दिन पहले छह लड़कियों का जबरन धर्मांतरण हुआ है. वह व्यक्ति डरा हुआ भी दिखता है इसलिए वह कहता है कि मैं पाकिस्तान की बुराई नहीं कर रहा हूं, पर सच तो कहना पड़ेगा. दरअसल पाकिस्तान में जो हिंदू रहते हैं, उनकी सामाजिक और राजनीति स्थिति बहुत ही खराब है.
1947 में जब देश का बंटवारा हुआ, तो उस वक्त टू नेशन का सिद्धांत धर्म के आधार पर दिया गया था. पाकिस्तान का निर्माण इसलिए किया गया क्योंकि मुसलमानों को अगर देश चाहिए था. बंटवारे के बाद पाकिस्तान एक इस्लामिक देश बना जबकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बना, जहां धर्म के आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं किया जाता है. पाकिस्तान चूंकि एक इस्लामिक राष्ट्र है, इसलिए वहां मुसलमानों के अलावा अन्य धर्म के लोगों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है. पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यक हैं और उनका दर्जा कानून और समाज दोनों के सामने ही मुसलमानों के बराबर का नहीं है, जबकि भारत का संविधान धर्म के आधार पर किसी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं करता है.