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  • 2025-11-13

Jharkhand Breaking: झारखंड के गृह सचिव को कल सुप्रीम कोर्ट में पेश होने का आदेश

Jharkhand Breaking: सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के गृह सचिव को 14 नवंबर को सुबह अदालत में पेश होने का आदेश दिया है. यह आदेश न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने दिया है. अदालत ने राज्य सरकार की लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताई है और कहा है कि झारखंड सरकार न्यायिक मामलों को लेकर गंभीर नहीं दिख रही है.


यह मामला मोहम्मद इमरान उर्फ गुड्डू द्वारा दायर अपील से जुड़ा है. इमरान ने झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उसकी जमानत याचिका को खारिज कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही झारखंड सरकार को इस मामले में अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया था, लेकिन राज्य सरकार की ओर से समय पर कोई जवाब दाखिल नहीं किया गया.


मंगलवार को जब मामला दूसरी बार सुनवाई के लिए आया, तब भी सरकार की ओर से कोई प्रतिनिधि अदालत में मौजूद नहीं था. इस पर नाराजगी जाहिर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि झारखंड राज्य हाल के दिनों में अदालत के प्रति बेहद उदासीन रवैया अपना रहा है. अदालत ने टिप्पणी की कि सरकार की ओर से जब कोई पेश होता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है.

इसी के साथ अदालत ने गृह सचिव को 14 नवंबर की सुबह अदालत में पेश होने का आदेश जारी किया है. न्यायालय ने निर्देश दिया कि आदेश की सूचना तत्काल गृह सचिव तक पहुंचाई जाए. साथ ही इमरान की अपील पर अगली सुनवाई की तारीख भी 14 नवंबर तय की गई है.

यह मामला उस ट्रायल से जुड़ा है, जिसमें इमरान को मुकदमे की प्रक्रिया के दौरान अभियुक्त के रूप में शामिल किया गया था. उसकी ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि उसी केस में दो अन्य लोगों को भी अभियुक्त बनाया गया था, जिन्हें हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत दे दी थी. जबकि उसकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी.

यह प्रकरण झारखंड सरकार की कानूनी तैयारी और अदालत के प्रति जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाता है. सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी इस बात का संकेत है कि राज्य सरकार की ओर से समय पर जवाब दाखिल करने या अदालत में पेश होने की प्रक्रिया में लगातार ढिलाई बरती जा रही है.
इस तरह की लापरवाही न केवल सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाती है बल्कि न्यायिक प्रक्रिया पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है. अदालत का गृह सचिव को व्यक्तिगत रूप से बुलाना इस बात का स्पष्ट संदेश है कि अब न्यायपालिका ऐसी उदासीनता को बर्दाश्त नहीं करेगी.

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