सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म जैसे नेटफ़्लिक्स, यूट्यूब और अन्य ओटीटी सेवाओं पर अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री की बढ़ती मात्रा पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा है कि केवल स्क्रीन पर चेतावनी पर्याप्त नहीं है क्योंकि अधिकांश लोग चेतावनी पढ़ने से पहले ही कंटेंट देखना शुरू कर देते हैं। कोर्ट ने सुझाव दिया है कि वयस्क सामग्री के लिए आधार-आधारित उम्र-पुष्टि (Age Verification) जैसे सख़्त उपाय लागू किए जा सकते हैं, जिससे बच्चों की अनचाहे कंटेंट तक पहुंच रोकी जा सके।
मामला और याचिकाएं
यह सुनवाई उन याचिकाओं से संबंधित है जिनमें कई कॉमेडियंस और पॉडकास्टर्स जैसे समय रैना और रणवीर अल्लाहबादिया पर असंवेदनशील और अश्लील टिप्पणियां करने के आरोप लगाए गए हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने दिव्यांग व्यक्तियों का मज़ाक उड़ाने पर कठोर नाराज़गी जताई और कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी की गरिमा को ठेस पहुंचाने का लाइसेंस नहीं दे सकती।
ऑनलाइन अश्लीलता पर कोर्ट की चिंता
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि किताबों या कला में मौजूद अश्लीलता को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन मोबाइल और डिजिटल स्क्रीन पर कंटेंट “एक क्लिक” में सामने आ जाता है। कई बार अनचाहा कंटेंट भी दिखने लगता है। इसलिए कोर्ट ने पूछा कि ऐसे हालात में सबसे प्रभावी नियंत्रण व्यवस्था क्या हो सकती है।
साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य सेंसरशिप बढ़ाना नहीं है, बल्कि समाज में संतुलन और सामंजस्य बनाए रखना है। कोर्ट ने कहा कि डिजिटल कंटेंट के लिए एक स्वतंत्र रेगुलेटरी संस्था की ज़रूरत अब महसूस की जा रही है, क्योंकि सेल्फ-रेगुलेशन प्रभावी साबित नहीं हो रहा।
दिव्यांगों पर असंवेदनशील टिप्पणियां और कानूनी सवाल
समय रैना द्वारा स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से संबंधित टिप्पणी पर कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई। एसएमए इंडिया फाउंडेशन की ओर से कहा गया कि यह टिप्पणी दिव्यांग समुदाय के प्रति असंवेदनशील और अपमानजनक थी। इस पर कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि दिव्यांगों की गरिमा को ठेस पहुँचाने पर कड़े कानून क्यों नहीं हैं?
क्या इस मामले में एससी-एसटी एक्ट जैसी सख़्त कानूनी व्यवस्था लागू की जा सकती है?
एंटी-नेशनल कंटेंट की परिभाषा पर बहस
सुनवाई में देश-विरोधी कंटेंट की अस्पष्ट परिभाषा पर भी चर्चा हुई। जस्टिस बागची ने कहा कि कई तरह की सामग्री समाज को बांट सकती है, लेकिन अधिकारियों को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह मनमाने ढंग से किसी भी चीज़ को “एंटी-नेशनल” घोषित कर दें। कोर्ट ने संकेत दिया है कि कानूनों को अधिक स्पष्ट और संतुलित बनाया जा सकता है।
सरकार की प्रतिक्रिया
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यूज़र-जेनरेटेड कंटेंट के नाम पर कोई भी व्यक्ति अपने मन मुताबिक चैनल बनाकर जो चाहे नहीं दिखा सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा ज़रूरी है, लेकिन सीमाएं तय होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने बताया कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर चर्चा कर रही है और आवश्यक होने पर कानूनों में बदलाव किए जा सकते हैं। हालांकि कोर्ट ने कहा कि ऐसे निर्णय जल्दबाजी में न लिए जाएं और जनता की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
दिव्यांग समुदाय के सम्मान को बढ़ावा देने का सुझाव
कोर्ट ने सुझाव दिया है कि कॉमेडियंस अपनी लोकप्रियता का उपयोग सकारात्मक कार्यों में करें
दिव्यांग व्यक्तियों के इलाज के लिए समर्पित फंड बनाया जाए,
कॉमेडियन हर महीने दो प्रदर्शन कर उस फंड में योगदान दें
अपने प्लेटफ़ॉर्म पर दिव्यांग लोगों की उपलब्धियों को नियमित रूप से जगह दें।
कोर्ट ने कहा है कि यह मुद्दा केवल दान का नहीं, बल्कि सम्मान और संवेदनशीलता का है।
अगली सुनवाई
कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।