Jamshedpur Big News: टाटा सब-लीज मामले में लम्बी कानूनी प्रक्रिया के बाद अब राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गयी है. हाईकोर्ट द्वारा दायर LPA को खारिज किये जाने के बाद सरकार ने शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल की है. सरकार की याचिका पर संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया गया है और सुनवाई जल्द होने की संभावना है. यह मामला Ashiana Housing Limited और Praikh Inn Pvt Ltd से जुड़ा है.
TATA STEEL LTD ने राज्य सरकार की सहमति के बाद इन दोनों कंपनियों को जमीन सब लीज पर देने का एग्रीमेंट किया था. इसके बाद Jamshedpur Notified Area Committee ने निर्माण कार्य की अनुमति भी दे दी थी. इसी दौरान उपायुक्त ने यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिया और रजिस्टर्ड सब लीज की प्रक्रिया रोक दी गयी.
मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो न्यायालय ने यह विचार किया कि क्या राज्य सरकार पहले दी गयी सहमति के बाद किये गये सब लीज एग्रीमेंट को रद्द कर सकती है. सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति गौतम कुमार चौधरी ने सरकार की दलीलों को अस्वीकार करते हुए Ashiana Housing और Parikh Inn के पक्ष में फैसला दिया. हाईकोर्ट ने TATA STEEL को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता पक्ष के साथ रजिस्टर्ड सब लीज करे और JNAC को नियमानुसार रिवाइज्ड प्लान स्वीकृत करने का आदेश दिया.
इसके बाद राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ LPA दायर किया, लेकिन यह अपील निर्धारित समय सीमा के बाद दाखिल की गयी. LPA में देरी के लिए सरकार ने यह कारण बताया कि महाधिवक्ता कार्यालय से निर्णय की जानकारी देर से मिली और 2024 विधानसभा चुनाव के लिए मतदाता पुनरीक्षण कार्य में उपायुक्त अत्यधिक व्यस्त थे.
हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एमएस रामचंद्रन और न्यायाधीश दीपक रौशन की पीठ ने इन कारणों को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने कहा कि मतदाता सूची का कार्य महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अन्य समान महत्व के कार्य पूरी तरह रोक दिये गये हों. अदालत ने देरी को अनुचित मानते हुए LPA को खारिज कर दिया.
सरकार द्वारा दायर शपथ पत्र में कहा गया था कि TATA Lease agreement की धारा-8 के तहत बनी कमेटी नियम सम्मत नहीं थी और इसलिए पूर्व में दी गयी मंजूरी रद्द की जानी चाहिए. सरकार का यह भी तर्क था कि लम्बी अवधि की लीज और सब लीज की प्रक्रिया समान है और इसमें पारदर्शिता के लिए खुले डाक की व्यवस्था जरूरी है. सरकार ने कहा कि जमीन का मालिकाना हक राज्य के पास है और टाटा स्टील को केवल सीमित अधिकार दिये गये हैं.
यह मामला राज्य सरकार की प्रशासनिक प्रक्रियाओं, समय प्रबंधन और कानूनी तैयारी पर गंभीर सवाल खड़े करता है. जिस मामले में सरकार स्वयं पक्ष थी, उसी में समय सीमा का पालन न कर पाना सरकारी मशीनरी की ढिलाई को उजागर करता है. हाईकोर्ट की टिप्पणी भी यही संकेत देती है कि सरकारी विभागों में समन्वय की कमी और फाइल प्रसंस्करण में देरी अब भी एक बड़ी समस्या है. अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है, जहां यह देखा जायेगा कि राज्य सरकार अपनी दलीलों को कितनी मजबूती से रख पाती है और क्या पूर्व के न्यायिक निष्कर्षों में कोई बदलाव संभव है.