Jharkhand News: झारखंड में सिकिदिरी हाइडल प्लांट की मरम्मत से जुड़ा पुराना मामला दोबारा चर्चा में है. करीब 12 साल पहले हुई अनियमितताओं और लापरवाही ने बिजली विभाग को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाया है. मामले की जांच में सामने आया है कि गलत फैसलों और समय पर कार्रवाई न होने के कारण विभाग को 134 करोड़ रुपये का बोझ उठाना पड़ रहा है.
जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच कमेटी बनाई थी
कॉमर्शियल कोर्ट के निर्देश के बाद बिजली निगम ने अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के लिए तीन सदस्यीय जांच कमेटी बनाई थी. इस कमेटी में जीएम (एचआर) सुनील दत्त खाखा, ऊर्जा विभाग के संयुक्त सचिव सौरभ सिन्हा और जीएम वित्त डी.के महापात्रा शामिल थे. जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट निगम प्रबंधन को सौंप दी है.
रिपोर्ट में छह अधिकारियों को दोषी पाया गया है. इन्हीं की अनदेखी और ढिलाई को आर्थिक नुकसान का मुख्य कारण बताया गया है. दोषी अधिकारियों में अमर नायक, कुमुद रंजन सिन्हा, तत्कालीन प्रोजेक्ट मैनेजर प्रदीप शर्मा, कार्यपालक अभियंता संजय सिंह और ऊर्जा निगम के दो विधि अधिकारी शामिल हैं. जांच में कहा गया है कि इन्होंने अदालत में विभाग का पक्ष ठीक से नहीं रखा और कई जरूरी दस्तावेज भी कोर्ट में पेश नहीं किए.
एचईएल को दिया गया था प्लांट मरम्मत का काम
सिकिदिरी हाइडल प्लांट की मरम्मत का काम वर्ष 2012 और 2013 के दौरान बीएचईएल को दिया गया था. बाद में बीएचईएल ने इस कार्य को एक निजी कंपनी नॉर्दर्न पावर को सौंप दिया. भुगतान को लेकर विवाद बढ़ा और नॉर्दर्न पावर ने मेरठ एमएसएमई कोर्ट में याचिका दायर कर दी. इसके बाद बीएचईएल ने रांची की अदालत में मामला दाखिल किया.
रांची की अदालत ने बीएचईएल के दावे पर सुनवाई करते हुए 20.87 करोड़ रुपये के कार्य पर ब्याज सहित 134 करोड़ रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया. बिजली निगम ने इस आदेश को चुनौती तक नहीं दी और मामला एकतरफा आगे बढ़ता रहा.
अधिकारियों ने कोर्ट के नोटिस को लगभग 9 महीने तक दबाए रखा
जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि निगम के दो अधिकारियों ने कोर्ट के नोटिस को लगभग 9 महीने तक दबाए रखा. इतना ही नहीं, यह भी नहीं बताया गया कि हाइडेल प्लांट का सिर्फ शॉर्ट टर्म वाला चार करोड़ का काम ही पूरा हुआ था जबकि लांग टर्म का काम अधूरा था. इसके विपरीत सभी बिलों के सत्यापन पर हस्ताक्षर कर दिए गए.
अब बिजली विभाग ने रांची अदालत के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की है. उधर जांच रिपोर्ट मिलने के बाद बिजली निगम प्रबंधन ने एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया है.
लापरवाही की वास्तविक कीमत कौन चूका रहा?
सिकिदिरी हाइडल प्लांट से जुड़ा मामला राज्य तंत्र की गंभीर खामियों को उजागर करता है. यह सिर्फ विभागीय लापरवाही नहीं बल्कि निर्णय प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है. नोटिस दबाने से लेकर अधूरे काम को पूरा माना जाना इस बात का संकेत है कि मामले को लाभ दिलाने की दिशा में मोड़ दिया गया. सार्वजनिक धन की जिम्मेदारी जिन पर थी, वही इसमें सबसे कमजोर साबित हुए. सुप्रीम कोर्ट में अपील से कुछ राहत की उम्मीद जरूर है, लेकिन यह साफ है कि इस लापरवाही की वास्तविक कीमत झारखंड की जनता को चुकानी पड़ रही है.