National News: केंद्र सरकार एक बार फिर रोजगार से ज्यादा नाम बदलने की राजनीति में उलझती नजर आ रही है. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा का नाम बदलने की तैयारी हैं. सरकार जहां ग्रामीण बेरोजगारी, भुगतान में देरी और काम की कमी जैसी मूल समस्याओं से जूझ रही है, वहीं योजना का नाम बदलकर “पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम” किया जा रहा है. अब सरकार को उनके अफसर क्यों नहीं बताते कि नाम बदलने से जमीनी हकीकत नहीं बदलती, जरूरत व्यवस्था सुधारने की है.
100 नहीं अब 125 दिन गारंटीशुदा रोजगार
इसी बीच केंद्र सरकार मनरेगा में एक बड़े संशोधन की योजना बना रही है. प्रस्ताव के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को मिलने वाले गारंटीशुदा रोजगार को 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन करने पर विचार किया जा रहा है. सरकारी सूत्रों के अनुसार इस संबंध में केंद्रीय मंत्रिमंडल स्तर पर चर्चा हो चुकी है और अधिनियम में संशोधन की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है.
सरकार की ओर से बताया जा रहा है कि रोजगार दिवस बढ़ाने और योजना का नाम बदलने दोनों प्रस्तावों को एक साथ आगे बढ़ाया जा सकता है. इसके लिए कानून में संशोधन जरूरी होगा. यह कवायद ऐसे समय में सामने आई है जब 16वें वित्त आयोग के तहत 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले पुरस्कारों में मनरेगा को शामिल रखने की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है.
इन राज्यों ने की थी रोजगार दिवस बढ़ाने की मांग
मनरेगा कानून में भले ही कम से कम 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी गई हो, लेकिन यह सीमा वर्षों से ऊपरी सीमा बनकर रह गई है. हकीकत यह है कि वर्ष 2024-25 में प्रति परिवार औसतन केवल करीब 50 दिन का ही रोजगार मिल सका. आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे राज्यों ने पहले ही कार्यदिवस बढ़ाने की मांग उठाई थी. हालांकि 100 दिन से अधिक काम देने की स्थिति में पूरा खर्च राज्यों को खुद उठाना पड़ता है, जिस कारण अधिकांश राज्य पीछे हट जाते हैं.
आंकड़े बताते हैं कि पिछले वित्तीय वर्ष में सृजित कुल 290 करोड़ व्यक्ति दिवसों में से केवल 4.35 करोड़ व्यक्ति दिवस ही राज्यों ने अपने बजट से उपलब्ध कराए. इससे साफ है कि केंद्र की भूमिका सीमित होने पर राज्यों के लिए अतिरिक्त रोजगार देना आसान नहीं होता.
कोविड काल में मनरेगा पर सबसे अधिक निर्भरता देखी गई थी
मनरेगा की स्थिति पर नजर डालें तो पिछले वर्ष 100 दिन का काम पूरा करने वाले परिवारों की संख्या 40.70 लाख थी, जबकि चालू वित्त वर्ष में यह आंकड़ा घटकर 6.74 लाख रह गया है. योजना की शुरुआत वर्ष 2005 से अब तक 4872.16 करोड़ व्यक्ति दिवस सृजित किए जा चुके हैं और करीब 11 लाख 74 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं. कोविड काल में इस योजना पर निर्भरता सबसे अधिक देखी गई थी.
वर्तमान वित्तीय वर्ष 2025-26 में 12 दिसंबर 2025 तक 4.71 करोड़ परिवारों ने मनरेगा के तहत काम मांगा और लाभ लिया है. ग्रामीण विकास मंत्रालय ने हाल ही में योजना को 2029-30 तक जारी रखने के लिए व्यय वित्त समिति को प्रस्ताव भेजा है, जिसमें पांच वर्षों के लिए 5.23 लाख करोड़ रुपए के परिव्यय की मांग की गई है.
आज भी करोड़ों ग्रामीण परिवारों को पूरा 100 दिन का काम नहीं मिल रहा
मनरेगा का नाम बदलने और कार्यदिवस बढ़ाने का प्रस्ताव कागज पर भले ही बड़ा दिखे, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि आज भी करोड़ों ग्रामीण परिवारों को पूरा 100 दिन का काम नहीं मिल पा रहा है. जब तक भुगतान, काम की उपलब्धता और पारदर्शिता जैसी समस्याओं का समाधान नहीं होता, तब तक नाम बदलने या दिनों की संख्या बढ़ाने से योजना की आत्मा मजबूत नहीं होगी. ग्रामीण रोजगार की असली जरूरत नीति नहीं, ईमानदार क्रियान्वयन है.