Jharkhand Politics: नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने पेसा कानून को लेकर झारखंड सरकार और कुछ राजनीतिक दलों पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा है कि पेसा की आड़ में आदिवासी समाज की पहचान, आस्था और परंपराओं को कमजोर करने की साजिश चल रही है. बाबूलाल मरांडी ने अपने एक्स हैंडल पर लिखा कि आदिवासी समाज की जड़ें प्राचीन सनातन मूल्यों से जुड़ी रही हैं और यही परंपराएं उनकी सामाजिक संरचना, स्वशासन व्यवस्था और जीवन पद्धति की आधारशिला हैं.
झारखंड में धर्मांतरण, घुसपैठ और लालच से आदिवासी समाज को बांटने की कोशिश
उन्होंने आरोप लगाया कि वोटबैंक की राजनीति और बाहरी धार्मिक प्रभावों के चलते आदिवासी समाज को उसकी मूल पहचान से दूर करने का प्रयास किया जा रहा है. बाबूलाल मरांडी का दावा है कि झारखंड में धर्मांतरण, घुसपैठ और लालच जैसे माध्यमों से आदिवासी समाज को बांटने की सुनियोजित कोशिशें हो रही हैं. उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया में राज्य सरकार की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए और कहा कि सरकारी मशीनरी भी कहीं न कहीं आदिवासियों को उनकी पारंपरिक पहचान से अलग करने की दिशा में काम करती नजर आ रही है.
आदिवासी स्वशासन की मूल भावना पर कोई स्पष्ट रुख नहीं
पेसा कानून को लेकर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने सरकार की मंशा पर भी संदेह जताया. उन्होंने कहा कि अदालत के दबाव में भले ही पेसा कानून लागू किया गया हो, लेकिन आज भी आदिवासी समाज को इसके वास्तविक स्वरूप और अधिकारों को लेकर भ्रम में रखा जा रहा है. सरकार की ओर से आदिवासी स्वशासन की मूल भावना पर कोई स्पष्ट रुख सामने नहीं आया है.
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि आदिवासी समाज की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था सदियों से चली आ रही है. मांझी परगना, मुंडा मानकी दिउरी, ढोकलो सोहोर, हातु मुंडा, पड़हा राजा, पाहन, सरदार, नापा और डाकुआ जैसे पद समाज में मान्यता प्राप्त रहे हैं. उनका कहना था कि पेसा कानून तभी प्रभावी हो सकता है जब इन पारंपरिक संस्थाओं और पदाधिकारियों को विधिवत अधिकार और मान्यता दी जाए.
पेसा नियमावली को सार्वजनिक किया जाए
नेता प्रतिपक्ष ने साफ तौर पर कहा कि जब तक पेसा के वास्तविक अधिकार मूल आदिवासियों और उनकी पारंपरिक ग्राम सभाओं को नहीं सौंपे जाते, तब तक यह कानून अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाएगा. उन्होंने राज्य सरकार से मांग की कि पेसा नियमावली को सार्वजनिक किया जाए और ग्रामसभा के अधिकारों तथा पारंपरिक स्वशासन प्रणाली को लेकर सरकार अपनी स्थिति स्पष्ट करे.
आदिवासी पहचान और स्वशासन के मुद्दा केंद्र में
पेसा कानून को लेकर बाबूलाल मरांडी के बयान ने झारखंड की राजनीति में एक बार फिर आदिवासी पहचान और स्वशासन के मुद्दे को केंद्र में ला दिया है. यह मामला केवल कानून के क्रियान्वयन तक सीमित नहीं है बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक जड़ों और राजनीतिक भविष्य से भी जुड़ा है. सरकार की स्पष्टता और पारंपरिक संस्थाओं को लेकर रुख आने वाले समय में इस बहस की दिशा तय करेगा.