Bihar Elections 2025: बिहार में चुनाव सिर पर हैं लेकिन एनडीए बिखरी हुई और कमजोर नजर आ रही है. कहने को मुख्यमंत्री का चेहरा नीतीश कुमार हैं, पर असल में भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रांडिंग पर ही चुनाव लड़ने की तैयारी में है. सवाल ये है कि जब नेतृत्व कमजोर है और समाज के अलग-अलग तबकों का प्रतिनिधित्व गायब है, तो एनडीए किस उम्मीद पर मैदान में उतरेगी?
बाढ़ और चुनावी राजनीति
बिहार की राजनीति इस समय उफान पर है. विधानसभा चुनाव आने वाले हैं और इसी बीच गंगा भी उफान मार रही है. बाढ़ ने विकास की पोल खोल दी है. जनता त्राहिमाम कर रही है और नीतीश कुमार पटना मेट्रो का उद्घाटन कर अपनी छवि सुधारने में जुटे हैं.
जहां दूसरे राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई चुनावी मुद्दे होते हैं, वहीं बिहार में वोट अब भी जाति की गणित से तय होते हैं. खासकर दलित समाज, जो आबादी का बड़ा हिस्सा है, सत्ता परिवर्तन का निर्णायक कारक तो रहा लेकिन सत्ता में वास्तविक भागीदारी आज तक नहीं पा सका.
केंद्र और राज्य दोनों जगह एनडीए की सरकार होने के बावजूद भाजपा बिहार में एक भी मजबूत दलित चेहरा खड़ा नहीं कर पाई है. राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा ने थावरचंद गहलोत, अर्जुन राम मेघवाल, रामदास आठवले जैसे नेताओं को आगे किया, लेकिन बिहार में दशकों से यह वर्ग पार्टी की प्राथमिकता से बाहर है.
रामविलास पासवान की मौत के बाद से एलजेपी बिखर चुकी है और चिराग पासवान खुद कमजोर स्थिति में हैं. दलित समाज भाजपा से सिर्फ सांकेतिक सहानुभूति पाता है, उनके घर जाकर खाना खाना या आरक्षित सीटों की बात करना, लेकिन आज का दलित समाज प्रतीक नहीं, असली हिस्सेदारी चाहता है, नीति निर्माण में भागीदारी और शिक्षा-रोजगार में ठोस योजना की मांग करता है.
शिक्षा और रोजगार: दलित सबसे पिछड़े
बिहार की शिक्षा व्यवस्था दलितों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है. सरकारी स्कूलों में पढ़ाई सिर्फ रजिस्टर तक सीमित है. दलित बच्चे न तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पा रहे हैं और न ही प्रतिस्पर्धा में टिक पा रहे हैं. उच्च शिक्षा की तरफ उनका रुझान लगातार घट रहा है. रोजगार के हालात और भयावह हैं. सरकारी नौकरियां लगभग बंद हैं. संविदा और आउटसोर्सिंग ने आरक्षण का असर भी खत्म कर दिया है. दलित युवा बेरोजगारी और हताशा में फंसे हैं.
भाजपा का "सम्राट कार्ड", नाकाम दांव
भाजपा ने दलित चेहरा न होने की स्थिति में सम्राट चौधरी को आगे किया. लेकिन कुशवाहा समाज से आने वाले सम्राट को न तो दलितों में स्वीकृति है और न ही व्यापक समर्थन. वह बार-बार पार्टी बदल चुके हैं और बिहार भाजपा का "ओवरनाइट प्रयोग" बनकर रह गए हैं. सुशील मोदी की जगह सम्राट चौधरी को खड़ा कर भाजपा ने जोखिम उठाया, लेकिन जमीनी स्तर पर उन्हें कोई पहचानता तक नहीं. दलित समाज उन्हें नेता मानने से साफ इनकार करता है.
जदयू सहयोगी है या बोझ?
भाजपा और जदयू का समीकरण खुद एनडीए की सबसे बड़ी कमजोरी है. नीतीश कुमार का स्वास्थ्य और उनका राजनीतिक कद दोनों कमजोर हो चुके हैं. ऐसे में भाजपा टूटी-फूटी जदयू के साथ चुनाव लड़ने को मजबूर है.
तेजस्वी यादव बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर लगातार आक्रामक हैं और उनका आधार दलित-मुस्लिम-पिछड़ा वर्ग तक फैल रहा है. अगर उन्होंने युवाओं और महिलाओं को लेकर ठोस ऐलान कर दिया तो भाजपा-एनडीए के लिए मुश्किल और बढ़ जाएगी.
दलितों की निर्णायक भूमिका
आने वाले चुनाव में दलित वर्ग निर्णायक भूमिका निभा सकता है. लेकिन सवाल यही है कि क्या दलित समाज इस बार प्रतीकों से आगे बढ़कर असली मुद्दों पर वोट करेगा? कौन दलित बच्चों की पढ़ाई सुनिश्चित करेगा? कौन बेटियों को कॉलेज तक ले जाएगा? कौन रोजगार देगा?
बिहार की राजनीति संक्रमण काल में है. भाजपा और जदयू अगर 2025 में सत्ता में लौटना चाहते हैं, तो सिर्फ मोदी ब्रांडिंग, सवर्ण एजेंडा और धार्मिक ध्रुवीकरण से काम नहीं चलेगा. दलितों को शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक भागीदारी का ठोस खाका देना होगा. वरना नतीजे अयोध्या जैसे हो सकते हैं, जहां मुद्दे तो बदले नहीं, लेकिन जनता ने कमान दुसरे हाथ को दे दी.