Jharkhand News: झारखंड में एक ही प्रतियोगी परीक्षा और एक ही चयन प्रक्रिया से सफल हुए कनीय अभियंताओं के साथ अलग-अलग व्यवहार का मामला सामने आया है. नगर विकास विभाग के लिए चयनित जेई को नियुक्ति के बाद अलग संवर्ग में डाल दिया गया जबकि उसी परीक्षा से चुने गए अन्य विभागों के जेई को दूसरा संवर्ग मिला. इससे सेवा शर्तों में बड़ा फर्क पैदा हो गया है.
कैसे शुरू हुआ पूरा मामला
झारखंड कर्मचारी चयन आयोग ने वर्ष 2021 में विभिन्न विभागों की अधियाचना को मिलाकर विज्ञापन संख्या 6/2021 जारी किया था. इसमें नगर विकास विभाग के लिए 250, पेयजल विभाग के लिए 171, जल संसाधन विभाग के लिए 440, पथ निर्माण विभाग के लिए 392 और कृषि विभाग के लिए 11 कनीय अभियंताओं के पद दर्शाए गए थे. इस विज्ञापन में सभी जेई को अवर अभियंत्रण सेवा संवर्ग के अंतर्गत रखा गया था.
विज्ञापन रद्द फिर नई परीक्षा
कुछ कारणों से विज्ञापन 6/2021 को रद्द कर दिया गया. बाद में इसी आधार पर झारखंड डिप्लोमा स्तरीय संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा 2023 आयोजित की गई. जिन अभ्यर्थियों ने पहले आवेदन किया था उन्हें दोबारा शुल्क नहीं देना पड़ा. परीक्षा के बाद परिणाम घोषित हुए और मार्च 2024 में सभी विभागों के लिए एक साथ नियुक्ति पत्र दिए गए.
नियुक्ति के बाद बदल गया संवर्ग
यहीं से विवाद शुरू हुआ. नगर विकास विभाग के लिए चयनित कनीय अभियंताओं को नियुक्ति पत्र में झारखंड नगरपालिका सेवा संवर्ग के अंतर्गत रख दिया गया. जबकि अन्य विभागों के जेई को अवर अभियंत्रण सेवा संवर्ग में ही माना गया. इससे नगर विकास के जेई की सेवा राज्य के नगर निकायों से जोड़ दी गई.
सेवा शर्तों में बड़ा अंतर
नगरपालिका सेवा संवर्ग में आने के कारण इन जेई को वही वेतन और सुविधाएं नहीं मिल रही हैं जो अन्य विभागों के जेई को मिलती हैं. अनियमित वेतन, जीपीएफ ओपीएस और पेंशन का अभाव, वेतन पर्ची न मिलना, बैंक ऋण में परेशानी और सेवा सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता जैसी समस्याओं से वे जूझ रहे हैं. दूसरी ओर उसी परीक्षा से चुने गए अन्य विभागों के अभियंताओं को सभी सरकारी लाभ मिल रहे हैं.
समान चयन फिर भी असमान व्यवहार
एक ही परीक्षा, एक ही विज्ञापन का आधार और एक ही चयन प्रक्रिया होने के बावजूद संवर्ग बदलने से नगर विकास विभाग के जेई खुद को भेदभाव का शिकार मान रहे हैं. उनका कहना है कि संवर्ग परिवर्तन ने उनकी सेवा और भविष्य दोनों को असुरक्षित बना दिया है.
यह मामला प्रशासनिक प्रक्रिया में समानता और पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है. जब चयन का आधार और परीक्षा एक ही है तो सेवा शर्तों में अंतर तर्कसंगत नहीं लगता. अगर समय रहते इस पर स्पष्ट नीति नहीं बनी तो यह विवाद आगे और गहराने की आशंका है.