एक पर्व, अनेक नाम, कश्मीर से कन्याकुमारी तक उत्सव
मकर संक्रांति भारत के उन गिने-चुने त्योहारों में से है जिसे पूरे देश में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। आइए जानते हैं भारत के विभिन्न हिस्सों में इसे किन नामों से पुकारा जाता है।
उत्तर प्रदेश और बिहार खिचड़ी
यहाँ इसे मुख्य रूप से खिचड़ी कहा जाता है। लोग गंगा और अन्य पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और दान-पुण्य करते हैं।
पंजाब और हरियाणा लोहड़ी
संक्रांति से एक दिन पहले यहाँ लोहड़ी मनाई जाती है। अग्नि जलाकर उसमें तिल, गुड़ और रेवड़ी अर्पित की जाती है।
गुजरात और राजस्थान उत्तरायण
इन राज्यों में आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। काइपो छे के शोर के साथ यहाँ पतंगबाजी का जुनून चरम पर होता है।
तमिलनाडु पोंगल
दक्षिण भारत में इसे चार दिनों के उत्सव पोंगल के रूप में मनाते हैं। यहाँ नई फसल के चावल को दूध में उबालकर पोंगल प्रसाद बनाया जाता है।
असम भोगाली बिहू असमिया लोग इसे माघ बिहू या भोगाली बिहू कहते हैं, जहाँ सामुदायिक भोज और भेलाघर बनाकर उत्सव मनाया जाता है।
कर्नाटक और आंध्र प्रदेश पेड्डा पाडुंगा
यहाँ इसे संक्रांति कहते हैं और गायों की पूजा की जाती है।
धार्मिक और वैज्ञानिक महत्त्व
मकर संक्रांति का महत्त्व केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार भी है
उत्तरायण का प्रारंभ
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं, अर्थात सूर्य उत्तर की ओर गमन करने लगते हैं। माना जाता है कि उत्तरायण में मृत्यु प्राप्त करने वाले को मोक्ष मिलता है जैसा कि भीष्म पितामह ने किया था।
दिनों का बड़ा होना
वैज्ञानिक दृष्टि से इस दिन के बाद से रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक है।
कृषि का उत्सव
यह किसानों के लिए खुशी का समय होता है क्योंकि रबी की फसलें पकने की तैयारी में होती हैं। यह प्रकृति को उसकी प्रचुरता के लिए धन्यवाद देने का दिन है।
तिल-गुड़ का स्वास्थ्य लाभ
सर्दियों के मौसम में तिल और गुड़ का सेवन शरीर को गर्मी प्रदान करता है। तिल-गुड़ घ्या, गोड-गोड बोला का संदेश आपसी प्रेम और सद्भाव को बढ़ाता है।
सामाजिक समरसता का संदेश
आज के आधुनिक युग में भी मकर संक्रांति की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। दान की परंपरा समाज के वंचित वर्गों की सहायता करना सिखाती है। प्रयागराज के माघ मेले में उमड़ने वाला जनसैलाब यह दर्शाता है कि आधुनिकता के बीच हमारी जड़ें आज भी संस्कृति से जुड़ी हैं। चाहे वह बंगाल का गंगासागर मेला हो या गुजरात का अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव, मकर संक्रांति हमें वसुधैव कुटुंबकम और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने की प्रेरणा देती है।
भारतीय संस्कृति के उस धागे के समान
मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति के उस धागे के समान है जो अलग-अलग परंपराओं को एक माला में पिरो देता है। यह पर्व नई ऊर्जा, नई फसल और नए संकल्पों का स्वागत करने का अवसर है।