सुबह क्षेत्र की विधायिका, पूर्णिमा दास साहू
घटनास्थल पर पहुंचीं और परिजनों व स्थानीय लोगों को यह आश्वासन दिया कि रांची से NDRF की टीम भेजी जा रही है। लेकिन शाम हो जाने के बावजूद कोई टीम नहीं पहुंची। जब दोबारा विधायिका से संपर्क किया गया, तो उन्होंने यह कहकर मामले से पल्ला झाड़ लिया कि “यह काम प्रशासन का है, मैं इसमें कुछ नहीं कर सकती”। इस रवैये से लोगों में भारी नाराज़गी है।
घटना के बाद प्रशासन की मौजूदगी तो दिखी, लेकिन किसी भी स्तर पर ठोस और प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। खोज-बचाव अभियान सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया, जिससे बच्चे की जान बचाने का वास्तविक प्रयास नजर नहीं आया।
आज दोपहर में स्थानीय जनता के सहयोग से JNAC के गोताखोरों को बुलाया गया, लेकिन सीमित संसाधनों और समुचित व्यवस्था के अभाव में वे भी बच्चे को खोजने में असफल रहे।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब तक DC, SSP और SDO में से किसी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, न ही NDRF की कोई टीम मौके पर भेजी गई है।
घटना को लेकर स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है
लोगों का कहना है कि अगर यही हादसा किसी VIP या मंत्री के बच्चे के साथ हुआ होता, तो पूरा प्रशासन खुद नदी में उतरकर खोज अभियान चला रहा होता। आम नागरिक के बच्चे की जान की कीमत क्या इतनी कम है यह सवाल आज हर किसी के मन में है।
एक मां की सिसकी और एक पिता की लाचारी क्या हमारा सिस्टम इतना बहरा हो चुका है बारीडीह के डोंगा घाट पर 11 वर्षीय अंकुश कालिंदी को नदी में डूबे 24 घंटे से ज्यादा बीत चुके हैं। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि हमारे शहर की प्रशासनिक व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों की संवेदनशीलता की परीक्षा है।