Jamshedpur Big News: अलकायदा से कथित संबंधों के आरोप में 9 वर्षों तक जेल में बंद रहे और साक्ष्य के अभाव में 1 मार्च 2025 को बरी हुए अब्दुल सामी और नसीम को एक बार फिर हिरासत में लिया गया. 3 फरवरी को सरायकेला-खरसावां जिले के कपाली स्थित उनके आवास से दिल्ली स्पेशल सेल की टीम ने दोनों को उठाया और दिल्ली ले जाकर पांच दिनों तक पूछताछ की, लेकिन कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलने पर उन्हें छोड़ दिया गया.
पहले भी लग चुके हैं गंभीर आरोप
अब्दुल सामी और नसीम को वर्ष 2016 में आतंक का नेटवर्क फैलाने और अलकायदा से जुड़े होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. उस समय शहर ही नहीं बल्कि पूरे झारखंड में इस मामले को लेकर सनसनी फैल गई थी. दोनों करीब 9 वर्षों तक जेल में रहे, लेकिन अदालत में अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिसके बाद कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया.
दिल्ली स्पेशल सेल की हालिया कार्रवाई
3 फरवरी को दिल्ली स्पेशल सेल की टीम ने दोनों को कपाली से हिरासत में लिया और दिल्ली ले जाकर लगातार पांच दिनों तक पूछताछ की. जांच के दौरान भी आतंक नेटवर्क से जुड़े होने का कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया, जिसके बाद पुलिस को दोनों को छोड़ना पड़ा. इस कार्रवाई के बाद इलाके में एक बार फिर चर्चा और असमंजस का माहौल बन गया.
कपाली से है दोनों का संबंध
अब्दुल सामी कपाली के वार्ड नंबर छह का निवासी है, जबकि नसीम भी कपाली क्षेत्र में किराए के मकान में रह रहा है. बार-बार हिरासत और रिहाई की प्रक्रिया से दोनों के परिवारों पर मानसिक और सामाजिक दबाव बना हुआ है.
सामी की पहली गिरफ्तारी 18 जनवरी 2016 को हरियाणा के मेवात से की गई थी. इसके बाद दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की सूचना पर 25 जनवरी 2016 को बिष्टपुर थाना में नामजद प्राथमिकी दर्ज की गई. इसी मामले में अब्दुल रहमान अली खान उर्फ कटकी को ओडिशा से और मौलाना कलीमुद्दीन को 16 सितंबर 2017 को टाटानगर रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया गया था.
अब एजेंसियों के रडार पर एक नाम
इस पूरे प्रकरण में मानगो आजादनगर निवासी सैयद मोहम्मद अर्शियान उर्फ हैदर अब भी सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर है. हैदर के खिलाफ इंटरपोल द्वारा रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया गया है और वह वर्ष 2017 से फरार है.
यह मामला दर्शाता है कि गंभीर आरोपों के बावजूद यदि ठोस साक्ष्य नहीं हों तो न्यायिक प्रक्रिया पर प्रश्न खड़े होते हैं. बार-बार हिरासत और फिर रिहाई से न सिर्फ आरोपितों का जीवन प्रभावित होता है, बल्कि कानून व्यवस्था और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं.