Jharkhand News: कोल्हान प्रमंडल के विभिन्न जिलों में हाथियों के बढ़ते हमलों ने ग्रामीणों का जीना मुहाल कर दिया है. जान-माल के भारी नुकसान के बावजूद प्रभावित परिवार सरकारी मदद के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने को विवश हैं. रेंजरों की भारी कमी और जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण राहत कार्यों की रफ्तार सुस्त बनी हुई है, जिससे पीड़ितों में भारी आक्रोश है.
मझगांव से लेकर गोईलकेरा तक पसरा मातम
मुआवजे की आस में बैठे परिवारों की स्थिति बेहद दयनीय है. मझगांव के बेनिसागर में जनवरी के पहले सप्ताह में प्रकाश दास और 18 वर्षीय दामोदर कुल्डी की मौत हाथी के हमले में हो गई थी, लेकिन हफ्तों बीतने के बाद भी परिजनों को सहायता राशि नहीं मिली. इसी तरह गोईलकेरा में दो मासूम बच्चों सहित चार लोगों की जान चली गई, जहां सर्वे होने के बावजूद राहत राशि अब तक बैंक खातों तक नहीं पहुंची है. केवल जान का नुकसान ही नहीं, बल्कि सरायकेला के कुकडू में कई किसानों की फसलें और घर भी हाथियों ने उजाड़ दिए हैं, जिनके मुआवजे की फाइलें रेंज कार्यालयों में धूल फांक रही हैं.
अधिकारियों की कमी बनी बड़ी बाधा
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में रेंजरों के 394 स्वीकृत पदों के मुकाबले महज 52 रेंजर ही कार्यरत हैं. रेंजरों की इस भारी कमी के कारण एक-एक अधिकारी के पास कई क्षेत्रों का प्रभार है. इसके चलते घटनाओं का भौतिक सत्यापन, कागजी कार्रवाई और रिपोर्ट तैयार करने में काफी समय लग रहा है. जब तक रेंजरों की पर्याप्त नियुक्ति नहीं होती, तब तक धरातल पर मुआवजे की प्रक्रिया में तेजी आना मुश्किल दिख रहा है.
विभाग का पक्ष
मामले पर प्रधान मुख्य वन संरक्षक रवि रंजन ने बताया कि जनवरी में हुई घटनाओं के मुआवजे की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. उन्होंने स्पष्ट किया कि सामान्यतः मुआवजे के भुगतान में एक से डेढ़ महीने का समय लगता है और पीड़ितों को जल्द ही राशि उपलब्ध करा दी जाएगी. रेंजरों की कमी और पदों के विस्तार के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि यह मामला फिलहाल सरकार के स्तर पर विचाराधीन है.