Jharkhand News: झारखंड बजट सत्र के चौथे दिन शनिवार को विधानसभा में आउटसोर्सिंग और संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) कर्मियों की समस्याओं पर जोरदार चर्चा हुई. विधायक जनार्दन पासवान ने तारांकित प्रश्न के जरिए सरकार का ध्यान इस ओर खींचा कि आउटसोर्सिंग के तहत काम करने वाले कर्मचारियों को बहुत कम वेतन मिल रहा है. उन्होंने सवाल उठाया कि जब नियमित और संविदा कर्मी एक ही जैसा काम करते हैं, तो उनके वेतन में इतना बड़ा अंतर क्यों है? इस भेदभाव से कर्मचारियों के बीच असंतोष बढ़ रहा है.
नियुक्तियों में लागू होगी आरक्षण नीति
संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने सरकार का पक्ष रखते हुए एक महत्वपूर्ण घोषणा की. उन्होंने स्पष्ट किया कि अब आउटसोर्सिंग के माध्यम से होने वाली नियुक्तियों में भी राज्य की आरक्षण नीति का पूरी तरह पालन किया जाएगा. सरकार यह सुनिश्चित करने जा रही है कि इन पदों पर स्थानीय और स्थायी निवासियों को ही प्राथमिकता मिले. मंत्री ने बताया कि चूंकि सरकारी बहाली की प्रक्रिया लंबी और जटिल होती है, इसलिए काम न रुके, इसके लिए संविदा और आउटसोर्सिंग का सहारा लेना पड़ता है.
कमीशन के खेल पर रोक और सीधे खाते में पैसा
सरकार के संज्ञान में यह बात आई है कि कई आउटसोर्सिंग एजेंसियां कर्मियों के मानदेय में से मोटा कमीशन काट लेती हैं. इस पर लगाम लगाने के लिए मंत्री ने आश्वासन दिया कि अब नई व्यवस्था बनाई जाएगी. इसके तहत यह सुनिश्चित किया जाएगा कि तय राशि का कम से कम 80 प्रतिशत हिस्सा सीधे कर्मचारी के खाते में जाए. एजेंसियों के अत्यधिक कमीशन लेने पर रोक लगाई जाएगी और कंपनियों के लिए प्रति कर्मचारी एक सीमित कमीशन ही तय किया जाएगा.
पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए नए निर्देश
संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि सरकार का मुख्य उद्देश्य प्रशासनिक कार्यों को सुचारु रूप से चलाने के साथ-साथ कर्मियों के हितों की रक्षा करना भी है. जल्द ही इस संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे. इससे नियुक्तियों में पारदर्शिता आएगी, जवाबदेही तय होगी और कर्मचारियों का शोषण बंद होगा. सरकार की इस पहल से उन हजारों युवाओं को राहत मिलने की उम्मीद है जो आउटसोर्सिंग के जरिए विभिन्न विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
आउटसोर्सिंग में आरक्षण लागू करना झारखंड सरकार का एक बड़ा नीतिगत कदम है, जो न केवल सामाजिक न्याय को मजबूती देगा बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के रास्ते भी खोलेगा. एजेंसियों के “कमीशन राज” पर लगाम लगाने का निर्णय कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति सुधारने में सहायक होगा. हालांकि, चुनौती इसे जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करने की होगी, ताकि एजेंसियां नियमों में कोई लूपहोल न ढूंढ सकें. यदि यह नीति सफल होती है, तो यह झारखंड में श्रम सुधारों की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी.