CAA In West Bengal: पश्चिम बंगाल में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत नागरिकता देने की प्रक्रिया को अब और अधिक गति मिलने वाली है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य में आवेदनों की बढ़ती संख्या को देखते हुए एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय लिया है. सरकार ने बंगाल में दो नई “अधिकार प्राप्त समितियों” (Empowered Committees) के गठन को मंजूरी दे दी है. यह कदम उन शरणार्थियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जो लंबे समय से भारतीय नागरिकता की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
आवेदनों के बढ़ते बोझ को कम करने की कवायद
सरकारी आंकड़ों और अधिकारियों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में सीएए पोर्टल पर प्राप्त होने वाले आवेदनों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी देखी जा रही है. वर्तमान में राज्य में दो समितियां पहले से ही इन आवेदनों की स्क्रूटनी और प्रक्रिया पर काम कर रही थीं, लेकिन आवेदकों की भारी तादाद को देखते हुए यह तंत्र कम पड़ रहा था. इसी दबाव को संतुलित करने और नागरिकता प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया को निर्बाध बनाने के लिए केंद्र सरकार ने अतिरिक्त समितियों के विस्तार का आदेश जारी किया है.
उच्चस्तरीय अधिकारियों के हाथों में होगी कमान
मंत्रालय द्वारा जारी राजपत्र अधिसूचना के अनुसार, इन नई समितियों की संरचना काफी प्रभावशाली रखी गई है. इनकी अध्यक्षता भारत सरकार के उप सचिव या उससे उच्च रैंक के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की जाएगी. इन अध्यक्षों का मनोनयन भारत के महारजिस्ट्रार और जनगणना आयुक्त के माध्यम से होगा. सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए, प्रत्येक समिति में सहायक खुफिया ब्यूरो (IB) के कम से कम अवर सचिव स्तर के अधिकारियों को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया गया है.
डाक विभाग और जनगणना अधिकारियों का समन्वय
प्रशासनिक तालमेल को बेहतर बनाने के लिए इस बार पश्चिम बंगाल के महा डाकपाल (Postmaster General) या उनके द्वारा नामित किसी वरिष्ठ डाक अधिकारी को भी समिति के सदस्य के रूप में जगह दी गई है. यह व्यवस्था पुरानी समिति से थोड़ी भिन्न है, जिसकी अध्यक्षता “निदेशक (जनगणना संचालन)” कर रहे थे. विशेषज्ञों का मानना है कि डाक विभाग के शामिल होने से दस्तावेजों के सत्यापन और संचार की प्रक्रिया अधिक सुगम हो सकेगी.
नागरिकता संशोधन अधिनियम: एक नजर में
उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने 11 मार्च 2024 को सीएए, 2019 के नियमों को देशभर में अधिसूचित किया था. संसद से कानून पारित होने के करीब चार साल बाद इसे जमीन पर उतारा गया. यह कानून पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के लोगों को नागरिकता प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त करता है. इसके लिए एकमात्र शर्त यह है कि आवेदक 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत में प्रवेश कर चुका हो.