Ranchi News: झारखंड की राजधानी रांची स्थित प्रतिष्ठित संस्थान बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान (BIT) मेसरा ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है. संस्थान को केंद्र सरकार की ओर से 2.4 करोड़ रुपये का शोध अनुदान (रिसर्च ग्रांट) प्राप्त हुआ है. यह बहु-संस्थागत अध्ययन विशेष रूप से यह समझने के लिए किया जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय परिस्थितियां और सामाजिक-आर्थिक कारक भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित कर रहे हैं. इस शोध के जरिए भविष्य में आने वाली चुनौतियों का आकलन कर उनसे निपटने के रास्ते खोजे जाएंगे.
प्रमुख संस्थानों के साथ मिलकर होगा काम
इस महत्वपूर्ण अध्ययन का नेतृत्व BIT मेसरा कर रहा है, लेकिन इसके व्यापक दायरे को देखते हुए कई अन्य बड़े संस्थानों को भी इसमें जोड़ा गया है. इस परियोजना में रांची मानसिक चिकित्सा एवं सहवर्ती विज्ञान संस्थान (RINPAS), BIT नोएडा परिसर, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) सिक्किम और NIT कालीकट सहयोग कर रहे हैं. ये सभी संस्थान भारत के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों जैसे उच्च पर्वतीय इलाकों, तटीय क्षेत्रों, घने शहरी इलाकों और पूर्वी भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं. इससे देश की विविध जलवायु स्थितियों और वहां के निवासियों की मानसिक स्थिति का एक सटीक डेटा तैयार किया जा सकेगा.
आधुनिक तकनीक और एआई का होगा इस्तेमाल
यह प्रोजेक्ट केवल पारंपरिक सर्वेक्षणों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग और भू-स्थानिक विज्ञान (Geospatial Science) जैसी आधुनिक तकनीकों का समावेश किया गया है. शोध के दौरान ऐसे पूर्वानुमान उपकरण (Predictive Tools) विकसित किए जाएंगे, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य योजना बनाने और समय से पहले मानसिक स्वास्थ्य संबंधी हस्तक्षेप करने में मदद करेंगे. इस तकनीक के जरिए शोध दल यह पता लगाने की कोशिश करेगा कि कैसे तापमान का उतार-चढ़ाव, खराब वायु गुणवत्ता और आर्द्रता जैसे कारक इंसानी दिमाग पर तनाव पैदा करते हैं.
रियल-टाइम डेटा से तैयार होगा पूर्वानुमान मॉडल
परियोजना की प्रमुख अन्वेषक डॉ. शमामा अनवर, जो कंप्यूटर विज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, के अनुसार शोध दल डेटा इकट्ठा करने के लिए पहनने योग्य स्वास्थ्य उपकरणों (Wearable Devices) और पोर्टेबल सेंसर का उपयोग करेगा. इन उपकरणों से प्राप्त डेटा और सामाजिक-आर्थिक तनाव संकेतकों का विश्लेषण कर मशीन लर्निंग मॉडल तैयार किए जाएंगे. ये मॉडल भविष्य में उन संभावित क्षेत्रों की पहचान कर सकेंगे जहां जलवायु परिवर्तन के कारण मानसिक तनाव बढ़ने का सबसे ज्यादा खतरा होगा. यह पहल देश में स्वास्थ्य सेवाओं के डिजिटलीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है.
नीति-निर्माताओं के लिए डिजिटल मंच का निर्माण
परियोजना के सह-प्रमुख अन्वेषक डॉ. कीर्ति अविशेक के अनुसार इस रिसर्च का एक बड़ा फायदा यह होगा कि इसके अंत में एक वेब-आधारित निर्णय सहयोग मंच (Decision Support System) विकसित किया जाएगा. यह पोर्टल नीति-निर्माताओं और स्वास्थ्य अधिकारियों को क्षेत्रीय प्रवृत्तियों को समझने और मानचित्रों के जरिए डेटा देखने की सुविधा प्रदान करेगा. इस अध्ययन को सफल बनाने के लिए डॉ. सुप्रीति कामिल्या, डॉ. स्वाति प्रसाद, डॉ. अमूल रंजन सिंह, डॉ. संग्राम रे और डॉ. राजू हजारी जैसे विशेषज्ञ भी अपना योगदान दे रहे हैं. यह शोध न केवल शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों को नया आधार भी देगा.