Seraikela News: सरायकेला-खरसावां जिले के कुकडू प्रखंड में जंगली हाथियों के तांडव ने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है. पिछले कई महीनों से हाथियों का झुंड न केवल गांवों में घुस रहा है, बल्कि मुख्य सड़कों पर भी डेरा जमाए हुए है. तिरुलडीह से सिरूम तक की मुख्य सड़क पर हाथियों की मौजूदगी के कारण आवाजाही पूरी तरह बाधित हो रही है. ग्रामीण खौफ के साये में जीने को मजबूर हैं, क्योंकि ये हाथी घरों को ढहाने के साथ-साथ किसानों की मेहनत से तैयार फसलों को भी चट कर रहे हैं.
मुख्य सड़क पर घंटों जमावड़ा, आवाजाही हुई ठप
हाथियों के झुंड का सबसे ज्यादा असर परिवहन पर पड़ा है. स्थानीय लोगों के अनुसार, गजराज का यह कुनबा अक्सर तिरुलडीह-सिरूम मार्ग पर घंटों खड़ा रहता है, जिससे राहगीरों और वाहनों की लंबी कतारें लग जाती हैं. शाम ढलते ही इस इलाके में सफर करना जानलेवा साबित हो रहा है. सड़क से लेकर खेतों तक हाथियों के निर्बाध विचरण ने कुकडू प्रखंड के दर्जनों गांवों में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है, जिससे लोग शाम के बाद घरों से निकलने में कतरा रहे हैं.
संसाधनों का अभाव: बिना पटाखे के कैसे भागेंगे हाथी?
ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का सबसे बड़ा आरोप वन विभाग की निष्क्रियता पर है. लोगों का कहना है कि विभाग की ओर से हाथियों को भगाने के लिए न तो पटाखे उपलब्ध कराए जा रहे हैं और न ही मशाल जलाने के लिए मोबिल का प्रबंध किया जा रहा है. पर्याप्त संसाधनों के अभाव में ग्रामीण अपनी सुरक्षा खुद करने को मजबूर हैं, जो अक्सर मानव-हाथी संघर्ष को न्योता देता है. चेतावनी दी गई है कि यदि विभाग ने जल्द ठोस कदम नहीं उठाए, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है.
करोड़ों का बजट फिर भी असुरक्षित ग्रामीण और वन्यजीव
वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए ग्रामीणों ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च करती हैं, लेकिन धरातल पर इसका कोई असर नहीं दिख रहा. जंगलों में भोजन और पानी की कमी के कारण ही जंगली जानवर आबादी वाले क्षेत्रों का रुख कर रहे हैं. स्थिति यह है कि जंगल अब जानवरों के लिए सुरक्षित नहीं रहे और गांव इंसानों के लिए. ग्रामीणों ने मांग की है कि विभाग तत्काल “एलिफेंट ड्राइव” (हाथियों को खदेड़ने का अभियान) चलाकर उन्हें सुरक्षित वन क्षेत्र में भेजे.