Religious Conversion: अनुसूचित जाति (SC) के दर्जे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और बेहद स्पष्ट फैसला सुनाया है. जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने मंगलवार को यह साफ कर दिया कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म (जैसे ईसाई या इस्लाम) को अपनाता है, तो उसका अनुसूचित जाति का दर्जा स्वतः ही समाप्त हो जाएगा. अदालत ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है जिसमें कहा गया था कि ईसाई धर्म अपनाने वाला व्यक्ति एससी समुदाय का सदस्य नहीं रह सकता.
ईसाई बनने पर नहीं मिलेगा SC/ST एक्ट का संरक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में कन्वर्ट हो चुका है और सक्रिय रूप से उसका पालन कर रहा है, वह अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत किसी भी तरह के कानूनी संरक्षण का दावा नहीं कर सकता. बेंच ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत अनुसूचित जाति का दर्जा केवल उन लोगों तक सीमित है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं.
पादरी के रूप में सक्रिय रहने का मामला आया सामने
अदालत के सामने आए एक विशिष्ट मामले में यह रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि अपीलकर्ता लगभग एक दशक से ईसाई धर्म का पालन कर रहा था और एक पादरी (Pastor) के रूप में रविवार की प्रार्थनाएं भी आयोजित कराता था. इन तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ऐसा व्यक्ति अनुसूचित जाति समुदाय का हिस्सा नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने कहा कि ईसाई धर्म का प्रचार और पालन करने वाले व्यक्ति को एससी वर्ग का मानकर विशेष अधिनियमों के तहत लाभ देना न्यायसंगत नहीं होगा.
धर्मांतरण और संवैधानिक अधिकारों पर स्पष्टता
इस फैसले ने धर्मांतरण के बाद आरक्षण और जातिगत पहचान को लेकर लंबे समय से चल रही कानूनी बहस पर विराम लगा दिया है. जानकारों का मानना है कि इस निर्णय का दूरगामी प्रभाव पड़ेगा, खासकर उन क्षेत्रों में जहां जाति आधारित लाभ लेने के लिए लोग धर्मांतरण के बाद भी अपनी पुरानी पहचान बनाए रखते थे. कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि धार्मिक परिवर्तन के साथ ही उस जातिगत पहचान से जुड़े संवैधानिक लाभ भी समाप्त हो जाते हैं.