Jharkhand High Court: झारखंड में बाघों के संरक्षण को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और वन विभाग के प्रति कड़ा रुख अपनाया है. मुख्य न्यायाधीश एस. एम. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने मामले में संतोषजनक जवाब दाखिल नहीं किए जाने पर गहरी नाराजगी व्यक्त की. अदालत ने स्पष्ट रूप से आदेश दिया है कि अगली सुनवाई के दौरान प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) समेत संबंधित उच्चाधिकारी व्यक्तिगत रूप से (सशरीर) कोर्ट में उपस्थित हों. कोर्ट ने चेतावनी दी कि अदालती आदेशों को हल्के में लेना स्वीकार्य नहीं है.
कनीय अधिकारियों के शपथ पत्र पर भड़का हाई कोर्ट
सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि पिछली बार कोर्ट ने PCCF को स्वयं शपथ पत्र (Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया था, लेकिन विभाग की ओर से कनीय (जूनियर) अधिकारियों ने जवाब दाखिल कर दिया. इस पर खंडपीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि PCCF हाई कोर्ट के आदेशों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं. अदालत ने कहा कि जब जिम्मेदारी तय की गई थी, तो कनीय अधिकारियों को आगे कर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता.
पलामू टाइगर रिजर्व और बाघों की घटती संख्या पर मांगी रिपोर्ट
बाघों के संरक्षण और राज्य में उनकी लगातार कम होती संख्या पर चिंता जताते हुए अदालत ने सरकार से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है. खंडपीठ ने विशेष रूप से वर्ष 2017 में जारी किए गए निर्देशों के अनुपालन की स्थिति की जानकारी मांगी है. इसके अलावा, पलामू टाइगर रिजर्व (PTR) में बाघों के संरक्षण, उनके पुनर्वास और सुरक्षा के लिए अब तक उठाए गए कदमों पर एक विस्तृत शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया गया है. अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि कागजों के बजाय धरातल पर संरक्षण के क्या कार्य हो रहे हैं.