Sponge Iron Pollution: सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल, चौका और कांड्रा-पातकुम रोड क्षेत्र में संचालित स्पंज आयरन इकाइयों ने पर्यावरण का संतुलन पूरी तरह बिगाड़ दिया है. इन उद्योगों से निकलने वाली काली धूल, सूक्ष्म कण और जहरीले धुएं के कारण स्थानीय लोगों का जीना मुहाल हो गया है. स्थिति यह है कि घरों के भीतर, पेड़ों की पत्तियों, जलस्रोतों और फसलों पर प्रदूषण की मोटी परत जम रही है. इसके परिणामस्वरूप क्षेत्र में दमा, खांसी, आंखों में जलन और त्वचा रोगों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं.
प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों पर सवाल, मानकों की उड़ रही धज्जियां
स्थानीय ग्रामीणों ने उद्योगों के प्रदूषण नियंत्रण सिस्टम पर गंभीर सवाल उठाए हैं. आरोप है कि ईएसपी (ESP), बैग फिल्टर, साइक्लोन सेपरेटर और वेट स्क्रबर जैसे अनिवार्य उपकरण या तो लगे ही नहीं हैं, या बिजली बचाने के चक्कर में उन्हें बंद रखा जाता है. “कंटीन्यूअस एमिशन मॉनिटरिंग सिस्टम” (CEMS) के आंकड़ों में हेरफेर की आशंका जताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की गई है. लोगों का कहना है कि झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला प्रशासन की लापरवाही के कारण कंपनियां खुलेआम एयर एक्ट 1981 और वाटर एक्ट 1974 का उल्लंघन कर रही हैं.
घनी आबादी और विस्थापितों के बीच मौत का व्यापार
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ये प्रदूषणकारी उद्योग स्कूलों, अस्पतालों और चांडिल बांध विस्थापितों के पुनर्वास क्षेत्रों के बिल्कुल करीब स्थित हैं. जो विस्थापित पहले ही अपना मूल स्थान खो चुके हैं, वे अब इस “धीमे जहर” को निगलने को मजबूर हैं. क्षेत्र की विधायक सबिता महतो और अन्य जनप्रतिनिधियों के प्रति भी जनता में भारी आक्रोश है. लोगों का आरोप है कि नेता और अधिकारी केवल प्रतीकात्मक कार्रवाई करते हैं, जबकि धरातल पर प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है. कंपनियों को दी गई पर्यावरण स्वीकृति (EC) और संचालन की अनुमति (CTO) की प्रक्रिया की भी उच्चस्तरीय जांच की मांग उठी है.
प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग, बड़े आंदोलन की सुगबुगाहट
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रदूषण पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई, तो क्षेत्र में भयावह पर्यावरणीय संकट पैदा हो जाएगा. मांग की गई है कि नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जाए और उनके लाइसेंस रद्द किए जाएं. साथ ही, प्रभावित गांवों में तत्काल स्वास्थ्य शिविर लगाने और पीड़ितों को मुआवजा देने की भी मांग की जा रही है. यदि प्रशासन ने समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए, तो चांडिल-चौका क्षेत्र के ग्रामीण एक बड़े और उग्र आंदोलन के लिए लामबंद हो सकते हैं.