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  • 2026-04-03

Hazaribagh Fake FIR Case: फर्जी एफआईआर कांड मामले में हजारीबाग कोर्ट के कड़े रुख के बाद अवर सचिव, दो इंस्पेक्टर और रिटायर्ड डीएसपी का सरेंडर, मिली जमानत

Hazaribagh Fake FIR Case: बड़कागांव के फर्जी एफआईआर मामले में फंसे पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के अवर सचिव कुमुद झा, इंस्पेक्टर रामदयाल मुंडा, इंस्पेक्टर अकील अहमद और सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) डीएसपी अखिलेश सिंह को आखिरकार हजारीबाग कोर्ट की चौखट पर आत्मसमर्पण करना पड़ा. आरोपियों के खिलाफ जमानतीय वारंट जारी होने के बाद सभी ने हजारीबाग ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट विवेक कुमार की अदालत में सरेंडर किया, जहां से कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी. दरअसल, मंटू सोनी उर्फ शशिकांत द्वारा दायर परिवाद पर झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस अनिल चौधरी की अदालत ने हजारीबाग कोर्ट की कार्रवाई पर लगी रोक (स्टे) को हटा दिया था, जिसके बाद निचली अदालत ने वारंट जारी किया था. इसके साथ ही हाईकोर्ट ने एनटीपीसी के पूर्व जीएम टी. गोपाल कृष्ण पर "दो हजार" रुपये और अवर सचिव कुमुद झा पर "एक हजार" रुपये का जुर्माना भी लगाया था.

बीडीओ का आवेदन बदलकर 29 निर्दोषों के नाम जोड़े
इस पूरे सनसनीखेज मामले की जड़ें 17 मई 2016 को बड़कागांव के चिरूडीह में हुई हिंसक झड़प से जुड़ी हैं. हजारीबाग न्यायालय की न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी शिवानी शर्मा की कोर्ट ने पाया था कि तत्कालीन कार्यपालक दंडाधिकारी (वर्तमान में गढ़वा बीडीओ) कुमुद झा के मूल आवेदन को बड़कागांव पुलिस ने कूटरचित तरीके से बदल दिया था. कुमुद झा द्वारा दिए गए हस्तलिखित (हाथ से लिखे) आवेदन में सिर्फ दो लोगों के नाम शामिल थे, लेकिन तत्कालीन थानेदार रामदयाल मुंडा ने अपने मुंशी से टाइप करवाकर एक नया फर्जी आवेदन तैयार किया और उसमें 29 अन्य बेकसूर लोगों के नाम जोड़ दिए. कोर्ट ने पाया कि एफआईआर कॉपी और अदालत में कुमुद झा के हस्ताक्षरों (सिग्नेचर) और तारीख की लिखावट में जमीन-आसमान का फर्क था.

अदालत ने गवाहों और दलीलों के बाद माना प्रथम दृष्टया दोषी
इस जालसाजी और पुलिसिया गुंडागर्दी के खिलाफ पीड़ित मंटू सोनी ने हजारीबाग कोर्ट में परिवाद वाद संख्या 1644/22 दायर किया था. मामले की सुनवाई के दौरान अधिवक्ताओं की दलीलों और चश्मदीद गवाहों के बयानों को सुनने के बाद कोर्ट ने तत्कालीन गढ़वा बीडीओ कुमुद झा, मधुपुर इंस्पेक्टर रामदयाल मुंडा, स्पेशल ब्रांच इंस्पेक्टर अकील अहमद, रिटायर्ड डीएसपी अखिलेश सिंह और एनटीपीसी के रिटायर्ड जीएम टी. गोपाल कृष्ण को प्रथम दृष्टया दोषी पाया. अदालत ने इन सभी के खिलाफ धारा 166, 166ए, 167, 218 और 220 के तहत संज्ञान लेते हुए समन जारी किया था. ये सभी दागी और आरोपी अधिकारी उस वक्त बड़कागांव और हजारीबाग में ही पदस्थापित थे.

थानेदार की मुंशीगीरी और फर्जी टाइपिंग का हुआ भंडाफोड़
जांच और बयानों में यह बात पूरी तरह शीशे की तरह साफ हो गई कि तत्कालीन थानेदार रामदयाल मुंडा ने बड़कागांव थाना कांड संख्या 135/16 की केस डायरी के पैरा एक में हेरफेर किया था. डायरी में कुमुद झा के हस्तलिखित आवेदन प्राप्त होने की बात लिखी गई थी, जबकि रिकॉर्ड पर मौजूद मूल एफआईआर पूरी तरह से टाइप की हुई थी. खुद कुमुद झा ने भी कोर्ट में गवाही देते हुए स्वीकार किया कि थानेदार ने उनके मूल आवेदन को बदलकर अपने मुंशी से टाइप कराकर नई एफआईआर दर्ज की थी. यह मामला पहले हजारीबाग सदर सीजीएम ऋचा श्रीवास्तव की अदालत में था, जिसे बाद में ट्रांसफर किया गया और वर्तमान में न्यायिक दंडाधिकारी विवेक कुमार की कोर्ट में इस हाई-प्रोफाइल केस की सुनवाई चल रही है.
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