Jharkhand News: कुख्यात प्रिंस खान गिरोह का बैकबोन माना जाने वाला सैफी पुलिस की गिरफ्त में आ चुका है और कानून के शिकंजे में है. पूछताछ में यह साफ हुआ है कि सैफी केवल एक अपराधी नहीं, बल्कि गिरोह का चीफ फाइनेंशियल मैनेजर था. व्यापारियों और ठेकेदारों से वसूली गई रंगदारी का पाई-पाई का हिसाब उसी के पास रहता था. किस गुर्गे को कितनी सैलरी देनी है और शूटरों तक सुपारी की रकम कैसे पहुंचानी है, यह सब सैफी ही तय करता था. उसकी गिरफ्तारी से प्रिंस खान के आतंक वाले साम्राज्य के आर्थिक ढांचे की चूलें हिल गई हैं.
दुबई तक फंड पहुंचाने के सीक्रेट रूट का पर्दाफाश
सैफी के कबूलनामे का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा दुबई तक पैसे पहुंचाने के तरीके से जुड़ा है. उसने पुलिस को उस गुप्त रास्ते और माध्यमों की जानकारी दी है, जिसके जरिए रंगदारी का मोटा हिस्सा सात समंदर पार बैठे प्रिंस खान तक सुरक्षित पहुंचता था. पुलिस अब उन सफेदपोश मददगारों और हवाला कारोबारियों के नेटवर्क को खंगाल रही है, जो इस मनी ट्रेल को अंजाम देने में सैफी की मदद करते थे. यह जानकारी गिरोह की अंतरराष्ट्रीय फंडिंग रोकने में निर्णायक साबित हो सकती है.
वर्चुअल धमकी और दहशत का हाइब्रिड मॉडल
जांच में सामने आया है कि मेजर उर्फ सैफी ने दहशत फैलाने के लिए एक विशेष हाइब्रिड मॉडल तैयार किया था. वह रसूखदार व्यवसायियों को वर्चुअल नंबरों से कॉल करता था और खुद को मेजर बताकर प्रिंस खान का खौफ पैदा करता था. रंगदारी न देने पर स्थानीय गुर्गों से वारदात करवाई जाती और तुरंत पर्चा वायरल कर खौफ को जिंदा रखा जाता था. व्यवसायियों के गोपनीय मोबाइल नंबर जुटाने से लेकर स्थानीय अपराधियों को सक्रिय करने तक की पूरी कमान सैफी के ही पास थी.
शूटर मैनेजमेंट और कोड वर्ड वाली डायरी का राज
सैफी न केवल पैसों का हिसाब रखता था, बल्कि गिरोह के लिए हथियारों की व्यवस्था और शूटर मैनेजमेंट भी देखता था. किस शूटर को कौन सा हथियार देना है और वारदात की प्लानिंग क्या होगी, इसमें उसकी अहम भूमिका रहती थी. वह हर गुर्गे के परफॉर्मेंस के आधार पर उनका कमीशन तय करता था और यह सारा लेखा-जोखा एक विशेष डायरी में कोड वर्ड में दर्ज करता था. पुलिस अब उस डायरी को डिकोड करने की कोशिश कर रही है, ताकि गैंग के आगामी मंसूबों और छिपे हुए सदस्यों का पता लगाया जा सके.