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  • 2026-04-25

West Bengal Election: चुनाव आयोग का सख्त संदेश, निष्पक्षता की बलि चढ़ाने वाले 5 पुलिस अधिकारियों पर गिरी गाज

West Bengal Election: पश्चिम बंगाल में चुनावी समर के बीच लोकतंत्र की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है. पहले चरण के मतदान के दौरान बरती गई अनियमितताओं, राजनीतिक पक्षपात और आम जनता के साथ दुर्व्यवहार के आरोपों में एक आईपीएस अधिकारी समेत पांच पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया है. आयोग का यह फैसला उन अधिकारियों के लिए एक चेतावनी है, जो खाकी की मर्यादा भूलकर किसी खास राजनीतिक विचारधारा या रसूख के दबाव में काम कर रहे थे. 

हिंसा के साये में खाकी की संदिग्ध भूमिका
सस्पेंड किए गए अधिकारियों में डायमंड हार्बर के एडिशनल एसपी (IPS) संदीप गरई, एसडीपीओ सजल मंडल और तीन प्रभारी निरीक्षक शामिल हैं. इन पर आरोप है कि पहले चरण के मतदान के दौरान जब हिंसा भड़की, तो इन्होंने सुरक्षा देने के बजाय मूकदर्शक बने रहने या पक्षपात करने को प्राथमिकता दी. भाजपा विधायक अग्निमित्रा पॉल की गाड़ी पर हमला और उम्मीदवार शुभेंदु सरकार की बेरहमी से पिटाई जैसी घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी थी. अधिकारियों की इस निष्क्रियता को आयोग ने कर्तव्यहीनता मानते हुए उनके खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए हैं, जिसकी आंच अब गृह मंत्रालय तक पहुंच सकती है.

अंतिम चरण से पहले प्रशासनिक सर्जरी
29 अप्रैल को होने वाले दूसरे और अंतिम चरण के मतदान से पहले यह प्रशासनिक सर्जरी बेहद मायने रखती है. आयोग ने न केवल पांच अधिकारियों को निलंबित किया, बल्कि डायमंड हार्बर की पुलिस अधीक्षक डॉ. ईशानी पाल को भी अनुशासन बनाए रखने में विफल रहने पर सेंस्योर (चेतावनी) जारी की है. 92 प्रतिशत से अधिक मतदान वाले बंगाल में सुरक्षा बलों की विश्वसनीयता बनाए रखना आयोग के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. इन अधिकारियों पर की गई कार्रवाई का उद्देश्य मतदान के अंतिम दौर में भयमुक्त और पारदर्शी माहौल तैयार करना है.

रक्षक जब भक्षक बनें
चुनावों में पुलिस का निष्पक्ष होना केवल एक संवैधानिक शर्त नहीं, बल्कि जनता के भरोसे की बुनियाद है. जब वर्दीधारी किसी एक पक्ष के साथ खड़े नजर आते हैं, तो न केवल चुनाव की शुचिता भंग होती है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का भी हनन होता है. बंगाल की सरजमीं पर चुनावी हिंसा का पुराना इतिहास रहा है, लेकिन 2026 के इन चुनावों में आयोग की यह त्वरित कार्रवाई यह संदेश देती है कि खाकी का रौब केवल अपराधियों के लिए होना चाहिए, मतदाताओं या राजनीतिक प्रतिनिधियों के दमन के लिए नहीं.
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