Editorial (Rishabh Rahul): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 मई से यूएई, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली की पांच दिवसीय यात्रा पर रवाना हो रहे हैं. इस दौरे का उद्देश्य निवेश आकर्षित करना और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना बताया जा रहा है. हालांकि, यह यात्रा एक बड़े विरोधाभास के बीच हो रही है. हाल ही में प्रधानमंत्री ने देश की जनता से राष्ट्रभक्ति के नाम पर पेट्रोल-डीजल कम इस्तेमाल करने, विदेश यात्राएं टालने और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सोने की खरीदारी तक स्थगित करने की अपील की थी. सवाल यह उठ रहा है कि जब आम आदमी से हर मोर्चे पर "त्याग" मांगा जा रहा है, तब सरकारी खर्च पर हो रहे इन भव्य विदेशी दौरों और रोड-शो पर "किफायत" की नीति क्यों लागू नहीं होती?
निवेश की हकीकत: 90 देशों की खाक छानी, पर टॉप-5 से भी बाहर हुई इकोनॉमी?
पिछले 11 वर्षों में प्रधानमंत्री ने 90 से अधिक देशों का दौरा कर मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत का प्रचार किया है. लेकिन आंकड़ों की बात करें तो भारत फिलहाल नॉमिनल जीडीपी के आधार पर टॉप-5 अर्थव्यवस्थाओं की सूची से भी बाहर हो गया है. ट्रंप के टैरिफ वार और वैश्विक मंदी के बीच, हर बार होने वाली "बिलियन डॉलर डील" की घोषणाएं जमीन पर रोजगार या मैन्युफैक्चरिंग में तब्दील होती नहीं दिख रही हैं. अब फिर से पांच देशों से निवेश लाने का दावा किया जा रहा है, जबकि पुरानी यात्राओं के ठोस परिणाम अब भी सवालों के घेरे में हैं.
विदेश नीति में दुविधा: अमेरिका का दबाव और ऊर्जा सुरक्षा पर संकट
भारत की वर्तमान विदेश नीति अमेरिका के भारी दबाव में नजर आ रही है. ईरान से संबंध बिगड़ने और रूस से तेल खरीद पर बढ़ती जटिलताओं के कारण भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में है. एक तरफ हम रूस-चीन के साथ संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका की शर्तों पर झुकने को मजबूर हैं. इसी रणनीतिक विफलता का नतीजा है कि देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं. विडंबना यह है कि सरकार इस विफलता का बोझ "बचत की अपील" के जरिए जनता के कंधों पर डाल रही है, जबकि खुद अपनी नीतियों में स्थिरता लाने में विफल रही है.
स्वदेशी का भाषण और विदेशी लग्जरी का शौक: विरोधाभास की पराकाष्ठा
मंच से लोकल फॉर वोकल और स्वदेशी अपनाने का उपदेश देने वाले नेतृत्व का अपना काफिला आज भी फोर्ड और मर्सिडीज जैसी विदेशी ब्रांड की गाड़ियों से लैस है. रैलियों और रोड-शो में लाखों लीटर ईंधन फूंका जाता है, लेकिन संदेश जनता के लिए "किफायत" का होता है. बिना किसी गहरे संरचनात्मक सुधार और निर्यात में वास्तविक उछाल के, केवल विदेशी धरती पर फोटो-अवसरों से "टॉप-3 अर्थव्यवस्था" का सपना देखना मुश्किल लगता है. जनता मेहनत और त्याग के लिए तैयार है, लेकिन वह चाहती है कि नेतृत्व पहले खुद स्वदेशी और किफायत का उदाहरण पेश करे.