Autism Awareness: दुनियाभर में बड़ी संख्या में बच्चे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर यानी एएसडी से प्रभावित हैं. यह एक ऐसी न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है, जो बच्चे के मानसिक और सामाजिक विकास को प्रभावित करती है. समस्या यह है कि इसके शुरुआती संकेत अक्सर सामान्य व्यवहार की तरह नजर आते हैं, जिसकी वजह से कई माता पिता समय रहते इसे पहचान नहीं पाते. विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती स्तर पर पहचान और सही सहयोग मिलने से बच्चे के विकास में काफी मदद मिल सकती है.
आखिर क्या होता है ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर एक जटिल न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, जो बच्चे के मस्तिष्क के विकास को प्रभावित करती है. इसका असर बच्चे के व्यवहार, बोलचाल, सीखने की क्षमता और दूसरों के साथ संबंध बनाने के तरीके पर पड़ता है. हर बच्चे में इसके लक्षण अलग अलग हो सकते हैं. यही वजह है कि इसे स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर कहा जाता है. कुछ बच्चों में लक्षण हल्के होते हैं, जबकि कुछ में इनका असर ज्यादा गंभीर हो सकता है.
बचपन में क्यों नहीं हो पाती समय पर पहचान
ऑटिज्म जन्म के बाद शुरुआती वर्षों से ही मौजूद होता है, लेकिन इसके कई संकेत सामान्य विकास प्रक्रिया से मिलते जुलते लगते हैं. ऐसे में माता पिता और परिवार के लोग अक्सर इसे सामान्य व्यवहार समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. कई मामलों में जब तक समस्या की स्पष्ट पहचान होती है, तब तक लक्षण काफी बढ़ चुके होते हैं और उन्हें नियंत्रित करना अपेक्षाकृत कठिन हो जाता है. यही कारण है कि बच्चे के व्यवहार में होने वाले छोटे बदलावों पर भी ध्यान देना जरूरी माना जाता है.
इन संकेतों को हल्के में न लें, हो सकते हैं ऑटिज्म के शुरुआती लक्षण
ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों में कुछ सामान्य संकेत देखने को मिल सकते हैं. ऐसे बच्चे अक्सर आंखों में आंखें डालकर बात करने से बचते हैं और परिवार के सदस्यों के साथ भावनात्मक जुड़ाव भी कम दिखाई देता है. कई बार वे दूसरे बच्चों के साथ घुलने मिलने या दोस्त बनाने में कठिनाई महसूस करते हैं.
कुछ बच्चे अपना नाम पुकारे जाने पर भी प्रतिक्रिया नहीं देते, जिससे कई बार सुनने की समस्या का भ्रम पैदा हो सकता है. इसके अलावा बोलने में देरी होना, कम शब्दों का इस्तेमाल करना या एक ही शब्द और वाक्य को बार बार दोहराना भी ऑटिज्म के प्रमुख संकेतों में शामिल है.
ऐसे बच्चे हाथ हिलाने, इशारा करने या सिर हिलाकर अपनी बात समझाने में भी परेशानी महसूस कर सकते हैं. कुछ बच्चों में एक ही काम को बार बार करने की आदत दिखाई देती है. जैसे खिलौनों को एक क्रम में सजाना. वहीं रोजमर्रा की दिनचर्या में अचानक बदलाव होने पर उनमें गुस्सा, बेचैनी या असहजता भी देखी जा सकती है.
इसके अलावा हाथों को लगातार हिलाना, शरीर को झुलाना, गोल गोल घूमना या किसी एक खास विषय या वस्तु में जरूरत से ज्यादा रुचि दिखाना भी ऑटिज्म के संकेत माने जाते हैं.
बच्चे के विकास में परिवार की भूमिका क्यों सबसे अहम मानी जाती है
विशेषज्ञों का मानना है कि ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के विकास में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है. माता पिता और परिवार के अन्य सदस्य यदि बच्चे के साथ ज्यादा समय बिताएं, उससे लगातार बातचीत करें और उसकी गतिविधियों में शामिल हों, तो इससे बच्चे के सामाजिक और भावनात्मक विकास को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है.
सकारात्मक माहौल और धैर्य के साथ दिया गया सहयोग बच्चे के आत्मविश्वास को बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाता है. अगर माता पिता को बच्चे के व्यवहार को लेकर किसी तरह का संदेह हो, तो विशेषज्ञ से सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए.
क्या मोबाइल और टीवी देखने से बढ़ता है ऑटिज्म
आज के समय में यह सवाल अक्सर पूछा जाता है कि क्या ज्यादा मोबाइल या टीवी देखने से बच्चों में ऑटिज्म हो सकता है. डॉक्टरों के अनुसार स्क्रीन टाइम सीधे तौर पर ऑटिज्म का कारण नहीं है. हालांकि जरूरत से ज्यादा मोबाइल, टीवी या अन्य डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल बच्चों के भाषा विकास और सामाजिक कौशल पर नकारात्मक असर डाल सकता है.
अत्यधिक स्क्रीन टाइम के कारण बच्चे लोगों से कम बातचीत करते हैं और सामाजिक गतिविधियों में कम भाग लेते हैं. इससे उनके व्यवहार में ऐसे बदलाव देखने को मिल सकते हैं, जो ऑटिज्म जैसे लक्षणों को और अधिक बढ़ावा दे सकते हैं.
छोटे बच्चों के लिए कितना स्क्रीन टाइम सुरक्षित माना जाता है
विशेषज्ञों के अनुसार दो साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल या किसी भी तरह की स्क्रीन से दूर रखना चाहिए. वहीं दो से पांच साल तक के बच्चों के लिए दिनभर में अधिकतम एक घंटे का सीमित स्क्रीन टाइम सुरक्षित माना जाता है.
पांच साल तक की उम्र में बच्चों के लिए बाहर खेलना, दौड़ना, कूदना और दूसरे बच्चों के साथ बातचीत करना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है. इससे उनके शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को बेहतर बनाने में मदद मिलती है.
ऑटिज्म के उपचार में थेरेपी की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है
ऑटिज्म का कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन सही समय पर शुरू की गई थेरेपी और विशेषज्ञों की देखरेख से लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. बिहेवियर थेरेपी से व्यवहार और संवाद कौशल को बेहतर बनाने में मिलती है मदद
बिहेवियर थेरेपी के माध्यम से बच्चे के व्यवहार, संचार क्षमता और सामाजिक कौशल में सुधार लाने का प्रयास किया जाता है. इससे बच्चे को अपनी भावनाएं व्यक्त करने और दूसरों के साथ बेहतर तरीके से जुड़ने में मदद मिलती है.
स्पीच और लैंग्वेज थेरेपी बोलने की समस्याओं को दूर करने में होती है उपयोगी
अगर बच्चे को बोलने या शब्दों का सही इस्तेमाल करने में परेशानी हो रही है, तो स्पीच और लैंग्वेज थेरेपी काफी मददगार साबित हो सकती है. इसकी मदद से संवाद करने की क्षमता को बेहतर बनाया जा सकता है.
ऑक्यूपेशनल थेरेपी रोजमर्रा के जरूरी कौशल सिखाने में करती है मदद
ऑक्यूपेशनल थेरेपी के जरिए बच्चों को लिखना, मोटर स्किल विकसित करना और खुद की देखभाल जैसे जरूरी कौशल सिखाए जाते हैं. इससे वे दैनिक गतिविधियों को अधिक स्वतंत्रता के साथ कर पाते हैं.
दवाइयों का इस्तेमाल केवल डॉक्टर की सलाह पर ही करें
ऑटिज्म के लिए कोई विशेष दवा उपलब्ध नहीं है. हालांकि इससे जुड़ी कुछ समस्याओं और लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए डॉक्टर कुछ दवाइयों की सलाह दे सकते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि केवल दवाओं के भरोसे ऑटिज्म का प्रबंधन संभव नहीं है. बेहतर परिणाम के लिए दवा, विभिन्न प्रकार की थेरेपी, परिवार का सहयोग और डॉक्टर के निर्देशों का पालन एक साथ जरूरी होता है.
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर कोई ऐसी स्थिति नहीं है, जिससे घबराने की जरूरत हो, लेकिन इसके संकेतों को नजरअंदाज करना भी सही नहीं माना जाता. समय पर पहचान, सही उपचार, परिवार का सहयोग और सकारात्मक माहौल बच्चों के बेहतर विकास में अहम भूमिका निभाते हैं. अगर बच्चे के व्यवहार में असामान्य बदलाव नजर आएं, तो बिना देरी किए विशेषज्ञ की सलाह लेना सबसे बेहतर कदम हो सकता है.