Europe Migration Crisis: बेहतर भविष्य और करियर की उम्मीद में हर साल बड़ी संख्या में भारतीय छात्र और प्रोफेशनल यूरोप का रुख करते हैं. लेकिन अब कई यूरोपीय देशों में बदलते हालात और प्रवासियों को लेकर बढ़ती नाराजगी ने इस सपने को पहले की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण बना दिया है. ब्रिटेन, आयरलैंड, जर्मनी और नीदरलैंड समेत कई देशों में इमिग्रेशन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है, जिसका असर नीतियों और जमीनी हालात दोनों पर दिखाई दे रहा है.
आखिर क्यों बढ़ रही है यूरोप में प्रवासियों को लेकर नाराजगी
विशेषज्ञों के मुताबिक कई देशों में आवास की कमी और लगातार बढ़ती कीमतें स्थानीय लोगों के लिए बड़ी चिंता का कारण बन चुकी हैं. महंगाई और सीमित संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच लोगों के एक वर्ग को लगता है कि प्रवासियों की बढ़ती संख्या उनके अवसरों को प्रभावित कर रही है.
साल 2015 के शरणार्थी संकट के बाद से स्कूलों, अस्पतालों और अन्य सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव बढ़ा है. इसके साथ ही सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं और सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों ने माहौल को और संवेदनशील बना दिया है. कई जगह विरोध प्रदर्शन हिंसक घटनाओं में भी बदलते नजर आए हैं.
बेलफास्ट से डबलिन तक बढ़ा तनाव और हिंसा
हाल के दिनों में उत्तरी आयरलैंड की राजधानी बेलफास्ट में एक सूडानी शरणार्थी से जुड़ी चाकूबाजी की घटना के बाद बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी. प्रदर्शनकारियों ने प्रवासी और अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाया. कई जगह घरों में तोड़फोड़ की गई और पुलिस पर पथराव की घटनाएं भी सामने आईं.
वहीं आयरलैंड की राजधानी डबलिन में भी आवास संकट और बढ़ती प्रवासी आबादी को लेकर विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं. दूसरी ओर ब्रिटेन में अवैध तरीके से छोटी नावों के जरिए पहुंचने वाले लोगों और उनके ठहरने पर होने वाले सरकारी खर्च को लेकर जनता के एक वर्ग में नाराजगी बढ़ती जा रही है.
भारतीय छात्रों और प्रोफेशनल्स पर क्या पड़ सकता है असर
यूरोप में रहने वाले अधिकांश भारतीय छात्र, डॉक्टर, इंजीनियर और आईटी क्षेत्र से जुड़े प्रोफेशनल हैं. ये लोग स्थानीय अर्थव्यवस्था में अहम योगदान देते हैं, लेकिन बढ़ते एंटी माइग्रेंट माहौल का असर आने वाली नीतियों पर पड़ सकता है.
वीजा नियमों में और बढ़ सकती है सख्ती
ब्रिटेन समेत कुछ देशों ने पहले ही अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए परिवार को साथ ले जाने से जुड़े नियमों में बदलाव किए हैं. आने वाले समय में स्टूडेंट वीजा, वर्क परमिट और पढ़ाई के बाद मिलने वाले वर्क ऑप्शन को लेकर नियम और सख्त किए जा सकते हैं.
स्थायी निवास और नागरिकता की राह हो सकती है कठिन
प्रवासियों की संख्या सीमित करने के दबाव के बीच कई सरकारें स्थायी निवास और नागरिकता से जुड़ी प्रक्रियाओं को और जटिल बना सकती हैं. इससे लंबे समय तक विदेश में बसने की योजना बनाने वाले लोगों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं.
बढ़ती नफरत का असर सामाजिक सुरक्षा पर भी पड़ सकता है
हालांकि भारतीय समुदाय को सीधे तौर पर निशाना बनाए जाने की घटनाएं सीमित हैं, लेकिन प्रवासियों के प्रति बढ़ती नकारात्मक सोच किसी भी विदेशी नागरिक के लिए असुरक्षा का माहौल पैदा कर सकती है. ऐसे हालात में सामाजिक तनाव और भेदभाव की आशंकाएं भी बढ़ जाती हैं.
एक तरफ जरूरत दूसरी तरफ सियासत, यूरोप तलाश रहा है संतुलन
यूरोप के कई देशों में आबादी तेजी से बुजुर्ग हो रही है और वहां कुशल कर्मचारियों की मांग लगातार बनी हुई है. एक तरफ राजनीतिक दल इमिग्रेशन को सीमित करने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उद्योग और कारोबारी क्षेत्र विदेशी प्रतिभाओं पर निर्भर हैं.
यूरोप में भारतीयों के लिए अवसर पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, लेकिन बदलते राजनीतिक माहौल और सख्त होती नीतियों के कारण विदेश में पढ़ाई, नौकरी और स्थायी निवास का रास्ता पहले के मुकाबले ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है. ऐसे में विदेश जाने की योजना बना रहे छात्रों और प्रोफेशनल्स के लिए बदलते नियमों और स्थानीय परिस्थितियों पर लगातार नजर रखना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है.