Jharkhand News: झारखंड हाईकोर्ट ने अधीक्षण अभियंता पद पर की गई प्रोन्नतियों को चुनौती देने वाली अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के इंजीनियरों की याचिकाओं को खारिज कर दिया है. अदालत के इस फैसले से राज्य सरकार द्वारा विभिन्न वर्षों में जारी की गई प्रोन्नति अधिसूचनाओं को राहत मिली है. माना जा रहा है कि यह निर्णय राज्य की अन्य सेवाओं में लंबित पदोन्नति विवादों पर भी प्रभाव डाल सकता है.
प्रोन्नति अधिसूचनाओं को दी गई थी चुनौती
याचिकाकर्ता इंजीनियरों ने राज्य सरकार द्वारा 12 कार्यपालक अभियंताओं को अधीक्षण अभियंता पद पर पदोन्नत किए जाने को चुनौती दी थी. उनका तर्क था कि वे संबंधित अधिकारियों से पहले कार्यपालक अभियंता बने थे, इसके बावजूद उनके बाद पदोन्नत हुए अधिकारियों को अधीक्षण अभियंता बना दिया गया. इसी आधार पर वर्ष 2019, 2022 और 2024 में जारी प्रोन्नति अधिसूचनाओं को निरस्त करने की मांग की गई थी.
वरीयता सूची के आधार पर हुई थी पदोन्नति
मामले की सुनवाई के दौरान प्रोन्नत अधिकारियों की ओर से अदालत को बताया गया कि उनकी नियुक्ति वर्ष 1989 और 1995 में हुई थी. राज्य सरकार द्वारा 5 मई 2015 को जारी सहायक अभियंताओं की वरीयता सूची के आधार पर ही उन्हें क्रमवार पदोन्नति प्रदान की गई. इसलिए पदोन्नति प्रक्रिया पूरी तरह नियमों और निर्धारित वरिष्ठता के अनुरूप की गई है.
अदालत ने याचिकाएं कीं खारिज
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने प्रोन्नति संबंधी अधिसूचनाओं को रद्द करने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यदि चाहें तो आरक्षित कोटे के तहत पदोन्नति का दावा कर सकते हैं, लेकिन इस आधार पर पहले से दी गई पदोन्नतियों को अवैध नहीं ठहराया जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित आर.के. संभरवाल बनाम पंजाब सरकार मामले का भी उल्लेख किया. अदालत ने कहा कि आरक्षण से जुड़े मामलों में उसी सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए, ताकि किसी कैडर में 100 प्रतिशत आरक्षण जैसी स्थिति उत्पन्न न हो. साथ ही आरक्षण की सीमा संविधान के अनुरूप 50 प्रतिशत तक ही बनी रहे.