Governor Film Review: असल घटनाओं और ऐतिहासिक किरदारों पर आधारित फिल्मों का दौर लगातार मजबूत हुआ है. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई फिल्मों को लेकर तथ्यों की व्याख्या और प्रस्तुति पर विवाद भी सामने आए हैं. अब 12 जून को विपुल शाह के प्रोडक्शन में बनी निर्देशक चिन्मय मंडलेकर की फिल्म गवर्नर सिनेमाघरों में पहुंची है. फिल्म 1990 के उस दौर की कहानी को सामने लाती है, जब भारत गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था और देश के सामने अभूतपूर्व चुनौतियां खड़ी थीं. लेकिन इतने संवेदनशील विषय को बड़े पर्दे पर उतारने की कोशिश के बावजूद फिल्म कई जगहों पर संतुलन और गहराई हासिल करने से चूकती नजर आती है.
शुरुआत दमदार लेकिन पहले हिस्से में कमजोर पड़ जाती है कहानी
दी कश्मीर फाइल्स में फारूक मलिक बिट्टा के किरदार से पहचान बनाने वाले चिन्मय मंडलेकर इस फिल्म के निर्देशक हैं. इससे पहले वह मनोज बाजपेयी के साथ इंस्पेक्टर झेंडे के जरिए निर्देशन में कदम रख चुके हैं.
गवर्नर की शुरुआत विरोध प्रदर्शनों, नारेबाजी और आत्मदाह की कोशिश कर रहे एक युवक के प्रभावशाली दृश्यों से होती है. शुरुआती कुछ मिनट दर्शकों को कहानी से जोड़ते हैं, लेकिन इसके बाद पहला भाग अपेक्षित असर पैदा नहीं कर पाता. कहानी मुख्य रूप से गवर्नर रमणन बने मनोज बाजपेयी और डिप्टी गवर्नर सीआर की भूमिका निभा रहे नौशाद मोहम्मद कुंजू के इर्द गिर्द आगे बढ़ती है.
बड़े फैसलों को एक व्यक्ति तक सीमित करने से प्रभावित होती है पटकथा
फिल्म में रमणन के फैसलों और उनकी भूमिका को काफी प्रमुखता दी गई है. कई अहम घटनाएं इस तरह दिखाई गई हैं, जैसे लगभग सभी निर्णय उन्हीं के अकेले प्रयासों का नतीजा रहे हों. यही वजह है कि स्क्रीनप्ले कई जगह सपाट और एक दिशा में चलता हुआ महसूस होता है.
फिल्म 1990 के आर्थिक संकट की गंभीरता को जरूर छूती है, लेकिन उस समय के तनाव, अनिश्चितता और देश के सामने खड़ी वास्तविक चुनौतियों की गहराई को पूरी मजबूती से दर्शकों तक पहुंचाने में सफल नहीं हो पाती.
राजनीतिक परिदृश्य और कुछ किरदारों को लेकर उठते हैं सवाल
फिल्म में तत्कालीन चंद्रशेखर सरकार की सीमाओं का जिक्र किया गया है, लेकिन उस दौर के व्यापक राजनीतिक समीकरणों को अपेक्षित विस्तार नहीं दिया गया. कहानी में मजबूत टकराव की कमी भी महसूस होती है और कई महत्वपूर्ण पहलुओं को बिना पर्याप्त जवाब के छोड़ दिया जाता है.
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की एक झलक भी फिल्म में दिखाई गई है, लेकिन उनकी मौजूदगी कहानी में कितना योगदान देती है, यह स्पष्ट नहीं हो पाता.
वहीं अर्थशास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से जुड़े कुछ दृश्य भी असहज महसूस होते हैं. आर्थिक उदारीकरण के प्रमुख चेहरों में गिने जाने वाले मनमोहन सिंह को फिल्म में इस तरह प्रस्तुत किया गया है, जहां रमणन का किरदार उन्हें आर्थिक नीतियों की जानकारी देता दिखाई देता है. यह प्रस्तुति कई दर्शकों को अटपटी लग सकती है.
इंटरवल के बाद पकड़ बनाती है फिल्म और क्लाइमैक्स छोड़ता है असर
फिल्म का दूसरा भाग पहले हिस्से की तुलना में ज्यादा मजबूत नजर आता है. इंटरवल के बाद कहानी गति पकड़ती है और घटनाक्रम में रोमांच भी बढ़ता है. देश के स्वर्ण भंडार को विदेश भेजने से जुड़े घटनाक्रम को प्रभावी ढंग से पेश किया गया है, जो फिल्म के सबसे दिलचस्प हिस्सों में शामिल है.
फिल्म के कुछ संवाद भी ध्यान खींचते हैं. खास तौर पर कुर्सी पर दीमक लगेगी तो दूसरी ले आएंगे, मगर देश में दीमक लग जाए तो दूसरा देश कहां से लाएंगे जैसा संवाद असर छोड़ने में सफल रहता है. संगीत भी कहानी और उसके माहौल के अनुरूप नजर आता है.
अभिनय के मोर्चे पर मनोज बाजपेयी सबसे मजबूत कड़ी साबित होते हैं
चार बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके मनोज बाजपेयी ने रमणन के किरदार में प्रभावशाली अभिनय किया है. उनकी बॉडी लैंग्वेज, संवाद अदायगी और सहज अंदाज किरदार को यादगार बनाते हैं.
लंबे समय बाद पर्दे पर नजर आई रोजा फेम मधु शाह की मौजूदगी भी सुखद अनुभव देती है. पत्रकार की भूमिका में अदा शर्मा अपनी भूमिका के अनुरूप दिखाई देती हैं. डिप्टी गवर्नर सीआर के किरदार में नौशाद मोहम्मद कुंजू ने भी संतुलित अभिनय किया है. वहीं राजीव गौर सिंह समेत अन्य सह कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है.