अदालत ने कहा नीतिगत मामलों में सीधे दखल नहीं दे सकता न्यायालय
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की पीठ ने कहा कि कानून बनाने और उसमें बदलाव करना न्यायपालिका का नहीं बल्कि संसद का क्षेत्र है. याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने दलील दी थी कि आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को भी विशेष लाभ मिलना समानता के सिद्धांत के विपरीत है. उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 27 का हवाला देते हुए क्रीमी लेयर व्यवस्था लागू करने की मांग उठाई थी.
उत्तर पूर्व का उदाहरण देकर उठाया गया समानता का मुद्दा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कहा कि उत्तर पूर्व के कुछ आदिवासी समुदायों से जुड़े लोग बड़े शैक्षणिक संस्थान चलाकर करोड़ों रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अब भी विभिन्न लाभ मिल रहे हैं. उनका कहना था कि इससे संविधान में निहित समानता के सिद्धांत पर असर पड़ता है और इस पर पुनर्विचार की जरूरत है.
कुछ मामलों के आधार पर पूरे समुदाय पर शक नहीं किया जा सकता, संसदीय समिति में रखने की सलाह
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कुछ लोगों द्वारा किसी प्रावधान का गलत इस्तेमाल किए जाने का मतलब यह नहीं है कि पूरे समुदाय को संदेह की नजर से देखा जाए. अदालत ने मामले का निपटारा करते हुए कहा कि यदि कानून में बदलाव की जरूरत महसूस होती है तो इसके लिए संसद और उसकी समितियां सबसे उपयुक्त मंच हैं. कोर्ट ने भरोसा जताया कि जनप्रतिनिधि ऐसे मुद्दों पर उचित स्तर पर विचार करने में सक्षम हैं.
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से साफ हो गया है कि SC ST समुदाय से जुड़े क्रीमी लेयर और इनकम टैक्स जैसे मुद्दों पर अंतिम फैसला न्यायपालिका नहीं बल्कि संसद के स्तर पर ही लिया जाएगा. अदालत ने संवैधानिक सीमाओं का सम्मान करते हुए याचिकाकर्ता के लिए संसदीय प्रक्रिया का रास्ता खुला रखा है.