Jharkhand: झारखंड हाईकोर्ट ने सेवा कानून और कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई गलत और अवैध पाई जाती है, तो उसका नुकसान कर्मचारी को नहीं भुगतना पड़ेगा। मामला सड़क निर्माण विभाग के कर्मचारी अमरेश कुमार झा से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 2017 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। इस कार्रवाई को उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। वर्ष 2021 में हाईकोर्ट ने इस बर्खास्तगी को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया और उनकी सेवा में पुनर्बहाली का आदेश दिया।
नो वर्क नो पे के फैसले को हाईकोर्ट ने किया खारिज
राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील की, लेकिन दोनों जगह से उसे राहत नहीं मिली। शीर्ष अदालत से भी अपील खारिज होने के बाद विभाग ने नवंबर 2023 में कर्मचारी को सेवा में वापस तो ले लिया, लेकिन 2017 से 2023 तक की अवधि के लिए वेतन देने से इनकार कर दिया। इसके बाद विभाग ने इस छह साल की अवधि को नो वर्क नो पे मानते हुए बकाया वेतन देने से मना कर दिया था। इस पर फिर से सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने विभाग के आदेश को रद्द कर दिया।
कर्मचारी को मिलेगा पूरा लाभ
अदालत ने कहा कि जब मूल बर्खास्तगी आदेश ही अवैध घोषित हो चुका है, तो कानूनन यह माना जाएगा कि कर्मचारी कभी सेवा से बाहर था ही नहीं। ऐसे में यह सिद्धांत लागू नहीं होता कि “नो वर्क नो पे” दिया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी को इसलिए काम से दूर रहना पड़ा क्योंकि उसे विभाग ने अवैध रूप से सेवा से बाहर कर दिया था। इस फैसले के साथ ही अदालत ने संकेत दिया कि कर्मचारी को बर्खास्तगी अवधि के सभी वेतन और अन्य सेवा लाभ दिए जाने चाहिए, जिससे सेवा कानून में पारदर्शिता और न्याय की दिशा में यह फैसला एक महत्वपूर्ण नजीर बन गया है।