Current News : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि जेन-ज़ी (Gen Z) के प्रदर्शनकारी युवाओं को राष्ट्रविरोधी कहना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि युवाओं का विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है और इसे विद्रोह नहीं, बल्कि संवाद एवं सहमति बनाने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।
संवाद के रास्ते बंद हों तो आंदोलन लोकतांत्रिक विकल्प
मुंबई के नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में इंडिया इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइटेड नेशंस (IIMUN) के 15वें स्थापना दिवस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में सड़कों पर उतरने वाले युवाओं को अक्सर राजनीतिक नजरिए से देखा गया। उन्होंने कहा कि जब संवाद के सभी रास्ते बंद हो जाते हैं, तब विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का स्वाभाविक और वैध माध्यम बन जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी आंदोलन का उद्देश्य समाज को विभाजित करना नहीं, बल्कि समाधान की दिशा में सहमति तैयार करना होना चाहिए। विरोध का अधिकार लोकतांत्रिक और संवैधानिक दायरे में रहकर प्रयोग किया जाना चाहिए।
सवाल पूछना विद्रोह नहीं, ज्ञान की संस्कृति का हिस्सा
संघ प्रमुख ने कहा कि पहले की पीढ़ियां बड़ों की बात बिना सवाल किए मान लेती थीं, लेकिन आज का युवा हर बात का तर्क चाहता है, प्रश्न पूछता है और खुलकर चर्चा करता है। उन्होंने कहा कि यह भारतीय परंपरा की शास्त्रार्थ संस्कृति का हिस्सा है और इसे विद्रोह नहीं माना जाना चाहिए।
पुलिस कार्रवाई के संदर्भ में पूछे गए सवाल पर मोहन भागवत ने कहा कि बिना तथ्यों के किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि बिना सबूत किसी एक पक्ष पर भरोसा करना पड़े, तो वह जेन-ज़ी युवाओं पर भरोसा करेंगे। उनके इस बयान को राजनीतिक हलकों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि हाल के वर्षों में विभिन्न आंदोलनों के दौरान प्रदर्शनकारियों पर राजनीतिक एजेंडा चलाने या राष्ट्रविरोधी होने जैसे आरोप लगते रहे हैं।