Ranchi News : झारखंड हाई कोर्ट ने गुमला में करीब नौ साल पुराने हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे लालू राम को बरी कर दिया है। कोर्ट ने गुमला की निचली अदालत के अप्रैल 2017 के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि लालू राम के खिलाफ हत्या का आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो सका।
हाई कोर्ट की खंडपीठ ने लालू राम की क्रिमिनल अपील पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल जेल से रिहा किया जाए।
2014 में कुल्हाड़ी से हुई थी हत्या, FIR में देरी को हाई कोर्ट ने माना अहम
अभियोजन के अनुसार, 23 अगस्त 2014 को गुमला के पालकोट थाना क्षेत्र के पीरहा चट्टान गांव में रामप्रीत राम की कुल्हाड़ी से हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि जमीन विवाद के चलते उसके चचेरे भाई लालू राम ने घर में सो रहे रामप्रीत की गर्दन पर कुल्हाड़ी से हमला किया था। 24 अगस्त 2014 को पालकोट थाना में मामला दर्ज किया गया। पुलिस जांच के बाद लालू राम के खिलाफ IPC की धारा 302 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई। इसके बाद निचली अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट ने FIR दर्ज होने में हुई देरी पर भी सवाल उठाए। कोर्ट के मुताबिक हत्या 23 अगस्त की सुबह करीब 11 बजे हुई थी। सूचक फानी कुमार राम को करीब 11.30 बजे घटना की जानकारी मिल गई थी और वह करीब 12 बजे घटनास्थल पर पहुंच भी गया था।
इसके बावजूद पुलिस को उसी दिन सूचना नहीं दी गई और अगले दिन FIR दर्ज की गई। कोर्ट ने कहा कि सूचक शिक्षित व्यक्ति था और उसके पास पुलिस को सूचना देने के लिए पर्याप्त समय था। FIR में देरी का संतोषजनक कारण भी नहीं बताया गया।
मुख्य गवाह की गवाही नहीं हुई, बरामद कुल्हाड़ी की FSL जांच नहीं हुई
कोर्ट ने गवाहों के बयानों में भी विरोधाभास पाया। मृतक की मां जितनी देवी को कथित प्रत्यक्षदर्शी बताया गया था, लेकिन वह अदालत में गवाही देने नहीं पहुंचीं। बाद में पुलिस ने उनका मृत्यु प्रमाणपत्र अदालत में पेश किया, जिसके अनुसार उनकी मृत्यु 6 अप्रैल 2016 को हो चुकी थी। हाई कोर्ट ने कहा कि कथित प्रत्यक्षदर्शी की गवाही उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में बाकी सबूतों का बेहद मजबूत होना जरूरी था।
पुलिस ने लालू राम के घर से कथित तौर पर कुल्हाड़ी बरामद की थी, लेकिन उसे फॉरेंसिक जांच के लिए FSL नहीं भेजा गया। कोर्ट ने कहा कि वैज्ञानिक जांच से यह पता चल सकता था कि हथियार पर मिले खून या अन्य साक्ष्य का संबंध हत्या से था या नहीं। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल हथियार की बरामदगी से हत्या का आरोप साबित नहीं हो जाता, खासकर तब जब प्रत्यक्षदर्शी की गवाही उपलब्ध न हो और हथियार की फॉरेंसिक जांच भी नहीं हुई हो।
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने लालू राम को संदेह का लाभ दिया और निचली अदालत की उम्रकैद की सजा रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया।